भोपाल, 30 जून।
सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर बढ़ाने और पढ़ाई की सतत निगरानी के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। शिक्षा विभाग अब लगभग 8 हजार वीएसी जनशिक्षकों को मैदान में उतारने जा रहा है। इन जनशिक्षकों का मुख्य कार्य स्कूलों में जाकर कक्षाओं का नियमित निरीक्षण करना, शिक्षकों की उपस्थिति देखना, बच्चों के सीखने के स्तर का आकलन करना और शैक्षणिक गतिविधियों की रिपोर्ट तैयार करना होगा। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कई वर्षों से सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे हैं। अभिभावक निजी स्कूलों की ओर रुख करते रहे हैं और सरकारी स्कूलों की छवि कमजोर पड़ती रही है। अब विभाग का मानना है कि यदि स्कूल स्तर पर ही सख्त और नियमित निगरानी हो जाए तो शिक्षा की दिशा बदल सकती है।
वीएसी का अर्थ है विद्यालय आकलन समन्वयक और जनशिक्षक का अर्थ है समाज से जुड़ा वह व्यक्ति, जो शिक्षा को जनआंदोलन बनाकर आगे बढ़ाए। प्रत्येक विकासखंड में इन जनशिक्षकों की तैनाती होगी। एक विकासखंड में 21 विद्यालयों पर एक जनशिक्षक की व्यवस्था रखी गई है। इस हिसाब से प्रदेशभर में लगभग 8 हजार जनशिक्षक मैदान में नजर आएंगे। ये जनशिक्षक प्रतिदिन स्कूल जाएंगे। वहां शिक्षक समय पर आए हैं या नहीं, यह देखेंगे। बच्चे कक्षा में सक्रिय हैं या नहीं, शिक्षण सामग्री का उपयोग हो रहा है या नहीं तथा मध्याह्न भोजन, पोशाक, छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं का लाभ बच्चों तक पहुंच रहा है या नहीं, इन सभी बिंदुओं पर जनशिक्षक मोबाइल ऐप या रजिस्टर में जानकारी दर्ज करेंगे और उसकी रिपोर्ट सीधे जिला एवं राज्य स्तर के अधिकारियों को भेजेंगे।
इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह निगरानी ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि जमीनी स्तर से ऊपर की ओर होगी। पहले निरीक्षण के लिए अधिकारी साल में एक-दो बार स्कूल जाते थे और औपचारिकता पूरी कर लौट आते थे। अब हर दिन हर स्कूल पर किसी न किसी जनशिक्षक की नजर रहेगी। इससे शिक्षकों में अनुशासन आएगा और वे कक्षा में लापरवाही नहीं बरत पाएंगे। साथ ही यदि किसी स्कूल में संसाधनों की कमी है या कोई शिक्षक बीमार है तो उसकी जानकारी तुरंत उच्च स्तर तक पहुंचेगी और समाधान भी जल्दी निकलेगा।
जनशिक्षक केवल निरीक्षक नहीं होंगे, बल्कि मार्गदर्शक भी बनेंगे। यदि कोई नया शिक्षक पढ़ाने में कमजोर है तो जनशिक्षक उसे पढ़ाने के तरीके सुझाएंगे। यदि बच्चे किसी विषय में कमजोर हैं तो अतिरिक्त अभ्यास की योजना बनाएंगे। इस प्रकार यह व्यवस्था दंडात्मक नहीं, बल्कि सहयोगात्मक होगी।
सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या शिक्षकों की कमी और बच्चों के सीखने की धीमी गति रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई स्कूल ऐसे हैं, जहां एक शिक्षक पांच कक्षाओं को संभालता है। ऐसे में प्रत्येक बच्चे पर व्यक्तिगत ध्यान देना संभव नहीं हो पाता। जनशिक्षक की उपस्थिति से शिक्षक पर सकारात्मक दबाव बढ़ेगा और वह अपनी तैयारी बेहतर करेगा। वहीं कमजोर बच्चों की पहचान कर उनके लिए विशेष कक्षाएं लगाने में भी मदद मिलेगी। विभाग का लक्ष्य है कि तीसरी कक्षा तक हर बच्चा पढ़ना, लिखना और जोड़-घटाना सीख जाए, क्योंकि आधार मजबूत होगा तो आगे की पढ़ाई भी आसान होगी। इसके लिए जनशिक्षक हर महीने बच्चों का आकलन करेंगे और प्रगति चार्ट तैयार करेंगे। माता-पिता को भी बुलाकर बताया जाएगा कि उनका बच्चा किस स्तर पर है और घर पर उसे किस प्रकार का अभ्यास कराया जाए।
जनशिक्षकों का चयन पारदर्शी तरीके से किया जाएगा। स्थानीय शिक्षित युवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि वे क्षेत्र की भाषा और संस्कृति को समझ सकें तथा बच्चों से बेहतर जुड़ सकें। चयनित जनशिक्षकों को पहले विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिसमें आकलन की विधियां, पाठ योजना की जांच, सीखने के स्तर को मापने के उपकरण और बच्चों से संवाद करने की कला सिखाई जाएगी। उन्हें तकनीकी उपकरण भी उपलब्ध कराए जाएंगे, ताकि वे फोटो, वीडियो और आंकड़े तुरंत अपलोड कर सकें। इससे रिपोर्ट में पारदर्शिता आएगी और फर्जी रिपोर्ट का खतरा कम होगा। विभाग ने स्पष्ट किया है कि जनशिक्षक शिक्षकों पर हावी नहीं होंगे, बल्कि दोनों मिलकर स्कूल को बेहतर बनाने का काम करेंगे।
चुनौतियां भी सामने होंगी। सबसे बड़ी चुनौती जनशिक्षकों की जवाबदेही तय करना है। यदि वे स्वयं समय पर स्कूल नहीं पहुंचे या रिपोर्ट तैयार करने में लापरवाही बरतें तो पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी। इसके लिए उनके कार्य का भी नियमित मूल्यांकन होना चाहिए और अच्छा काम करने वालों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। दूसरी चुनौती संसाधनों की है। 8 हजार लोगों को मानदेय, प्रशिक्षण और उपकरण उपलब्ध कराना एक बड़ा खर्च है, लेकिन शिक्षा पर किया गया खर्च कभी व्यर्थ नहीं जाता, क्योंकि एक शिक्षित बच्चा ही भविष्य में देश की प्रगति में योगदान देता है। तीसरी चुनौती शिक्षकों और जनशिक्षकों के बीच समन्वय की है। यदि दोनों के बीच टकराव हुआ तो स्कूल का वातावरण प्रभावित हो सकता है। इसलिए शुरुआत से ही यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि जनशिक्षक मित्र हैं, आलोचक नहीं।
अभिभावकों और समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जब जनशिक्षक स्कूल आएं तो ग्राम पंचायत और स्कूल प्रबंधन समिति के सदस्य भी उनका सहयोग करें। वे देखें कि जनशिक्षक निष्पक्षता से काम कर रहे हैं या नहीं और शिक्षक भी पूरा सहयोग दे रहे हैं या नहीं। यदि गांव का व्यक्ति ही शिक्षा की निगरानी करेगा तो स्कूल गांव से कटेगा नहीं, बल्कि गांव का गौरव बनेगा। निजी स्कूलों से प्रतिस्पर्धा तभी संभव है, जब सरकारी स्कूलों की कक्षाओं में अनुशासन और पढ़ाई का स्तर ऊंचा हो। यह तभी होगा, जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से आकर देखे कि स्कूल में वास्तव में क्या हो रहा है।
लगभग 8 हजार वीएसी जनशिक्षकों की तैनाती सरकारी शिक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय लिख सकती है। यह कदम केवल निरीक्षण का नहीं, बल्कि शिक्षा को जनआंदोलन बनाने का है। जब मैदान में उतरकर कोई व्यक्ति प्रतिदिन पूछेगा कि आज बच्चों ने क्या सीखा, तो शिक्षक भी पूरी तैयारी के साथ कक्षा में आएगा और बच्चे भी पढ़ाई में अधिक रुचि लेंगे। शिक्षा की गुणवत्ता एक दिन में नहीं सुधरती, लेकिन निरंतर निगरानी और ईमानदार प्रयास से निश्चित रूप से सुधर सकती है। यदि यह योजना प्रभावी ढंग से लागू हुई तो आने वाले वर्षों में सरकारी स्कूलों के परिणाम बेहतर होंगे, ड्रॉपआउट दर घटेगी और अभिभावकों का विश्वास भी वापस लौटेगा, क्योंकि देश का भविष्य उन्हीं बच्चों के हाथों में है, जो आज सरकारी स्कूलों की बेंच पर बैठे हैं, और 8 हजार जनशिक्षक उसी भविष्य को संवारने का दायित्व निभाएंगे।












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