नई दिल्ली, 30 जून।
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। अब विदेशी विश्वविद्यालयों की डिग्री के लिए लाखों रुपये खर्च कर सात समंदर पार जाने की मजबूरी खत्म हो रही है। ऑक्सफोर्ड, येल, इलिनॉयस टेक, विक्टोरिया यूनिवर्सिटी और अन्य बड़े नाम अब भारत में ही अपने कैंपस खोल रहे हैं। शिक्षा मंत्रालय की मंजूरी के बाद 15 विदेशी विश्वविद्यालयों को मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहरों में कैंपस शुरू करने की अनुमति मिल चुकी है। इनमें से अधिकांश कैंपस का पहला बैच अगस्त से शुरू होना तय है। पहले बैच में प्रत्येक कैंपस में 200 से 250 छात्रों से शुरुआत होगी और अगले पांच वर्षों में इसे बढ़ाकर 1,000 से 1,200 तक ले जाने का लक्ष्य है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा छात्रों और अभिभावकों को फीस के मोर्चे पर मिलेगा। विदेश में पढ़ाई का कुल खर्च अब 40 प्रतिशत तक कम हो जाएगा। इसकी वजह साफ है। छात्र को रहने-खाने, वीजा, यात्रा और बीमा पर होने वाला भारी खर्च नहीं उठाना पड़ेगा। कोर्स की संरचना ऐसी रखी गई है कि छात्र को एक से दो सेमेस्टर विदेश में पढ़ने का मौका मिलेगा, जबकि बाकी की पढ़ाई भारत स्थित कैंपस में होगी। इससे डिग्री तो विदेशी विश्वविद्यालय की मिलेगी, लेकिन जेब पर बोझ घटेगा। साथ ही जॉब नेटवर्क भी मजबूत होगा, क्योंकि ये विश्वविद्यालय अपने वैश्विक इंडस्ट्री टाई-अप का लाभ भारतीय कैंपस के छात्रों को भी देंगे।
पिछले पांच वर्षों में विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। 2020 में 6.9 लाख छात्र विदेश गए थे, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 13.3 लाख तक पहुंच गया। 2025 में 16 लाख से अधिक छात्रों के विदेश जाने का अनुमान है। इतनी बड़ी संख्या को देखते हुए विदेशी विश्वविद्यालयों ने भारत को सबसे बड़े शिक्षा बाजार के रूप में पहचाना है। यूजीसी द्वारा विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति देने के बाद यह रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। अब इन विश्वविद्यालयों को भारतीय छात्रों तक पहुंचने के लिए मेलबर्न या लंदन जाने की जरूरत नहीं है। विश्वस्तरीय शिक्षा अब भारत में उपलब्ध होगी। कैंपस में वही फैकल्टी, वही पाठ्यक्रम और वही डिग्री मिलेगी, जो मूल कैंपस में मिलती है। दूसरा लाभ लागत में कटौती का है। अमेरिका या ब्रिटेन में ग्रेजुएशन पर औसतन 80 लाख से 1.2 करोड़ रुपये खर्च होते हैं, जबकि भारत में यही डिग्री 45 से 60 लाख रुपये में पूरी हो सकेगी। तीसरा लाभ सैंडविच प्रोग्राम का है। छात्र तीन वर्ष के कोर्स में छह महीने से एक वर्ष तक विदेशी कैंपस में पढ़ सकेगा। इससे उसे अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर भी मिलेगा और खर्च भी नियंत्रित रहेगा।
विदेशी विश्वविद्यालयों ने भारतीय छात्रों के लिए पात्रता को भी अपेक्षाकृत लचीला रखा है। 12वीं में न्यूनतम 75 प्रतिशत और ग्रेजुएशन में 55 से 70 प्रतिशत अंक आवश्यक हैं। बोर्ड के अंकों की अनिवार्यता में भी कुछ छूट दी गई है। 85 प्रतिशत अंक होने पर आईईएलटीएस देने की आवश्यकता नहीं होगी। पाठ्यक्रम, परीक्षा और ग्रेडिंग पूरी तरह मूल कैंपस जैसी होगी। इसका मतलब है कि छात्र को वही गुणवत्ता मिलेगी, लेकिन प्रवेश की दौड़ अपेक्षाकृत आसान होगी।
शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक, अब तक 15 विदेशी विश्वविद्यालयों को लेटर ऑफ इंटेंट जारी किए जा चुके हैं। इनमें ब्रिटेन की यॉर्क और एबरडीन, अमेरिका की इलिनॉयस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, ऑस्ट्रेलिया की विक्टोरिया यूनिवर्सिटी और वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी शामिल हैं। मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु के अलावा गुजरात के गिफ्ट सिटी में भी दो विश्वविद्यालयों ने कैंपस के लिए जगह ले ली है। 10,000 से अधिक आवेदन मिल चुके हैं, जो इस मॉडल की लोकप्रियता को दर्शाते हैं।
विदेशी कैंपस के आने से भारतीय निजी और सरकारी विश्वविद्यालयों पर गुणवत्ता सुधारने का दबाव बढ़ेगा। प्रतिस्पर्धा से फीस का ढांचा भी अधिक तर्कसंगत होगा। वहीं भारतीय विश्वविद्यालयों के लिए विदेशी संस्थानों के साथ रिसर्च और फैकल्टी एक्सचेंज के नए अवसर खुलेंगे। इंडस्ट्री से जुड़े कोर्स, आधुनिक सुविधाएं और बेहतर शिक्षण व्यवस्था अब सामान्य अपेक्षा बन जाएंगी। जो संस्थान समय के साथ नहीं बदलेंगे, वे पीछे छूट जाएंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रवेश लेने से पहले तीन बातों की जरूर जांच करनी चाहिए। पहली, यूजीसी से मान्यता पत्र। दूसरी, डिग्री का प्रारूप—यह सुनिश्चित कर लें कि डिग्री मूल कैंपस से जारी होगी या भारतीय कैंपस के नाम से। तीसरी, प्लेसमेंट रिकॉर्ड। चूंकि ये कैंपस नए हैं, इसलिए पहले दो-तीन बैच के प्लेसमेंट पर नजर रखना जरूरी होगा। केवल ब्रांड के नाम पर निर्णय न लें, बल्कि कोर्स कंटेंट और फैकल्टी प्रोफाइल का भी मूल्यांकन करें।
सरकार का लक्ष्य है कि 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात 50 प्रतिशत तक पहुंचे। विदेशी विश्वविद्यालयों की मौजूदगी से न केवल छात्रों का पलायन रुकेगा, बल्कि भारत एजुकेशन हब के रूप में भी उभरेगा। अफ्रीका, मध्य-पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के छात्र भी भारतीय कैंपस का रुख कर सकते हैं। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और रोजगार के नए अवसर भी बनेंगे। यह बदलाव केवल फीस का नहीं, बल्कि सोच का है। अब विदेशी डिग्री सिर्फ संपन्न परिवारों के बच्चों तक सीमित नहीं रहेगी। मध्यम वर्ग का छात्र भी येल या ऑक्सफोर्ड जैसी प्रतिष्ठित डिग्री का सपना भारत में रहकर पूरा कर सकेगा। शिक्षा का लोकतंत्रीकरण ही नए भारत की असली पहचान है और विदेशी कैंपस का आगमन उसी दिशा में एक बड़ा कदम है। आने वाले दो वर्षों में तस्वीर और स्पष्ट होगी, लेकिन इतना तय है कि डिग्री अब अपेक्षाकृत सस्ती होगी और अधिक लोगों की पहुंच में होगी।












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