संपादकीय
30 Jun, 2026

देशी उत्पादों का जलवा: लस्सी-छाछ ने पछाड़ा कोल्ड ड्रिंक को

देश में बढ़ती गर्मी, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और कम कर व्यवस्था के चलते लस्सी, छाछ तथा अन्य डेयरी पेयों की मांग तेजी से बढ़ रही है।

नई दिल्ली, 30 जून।

इस साल की रिकॉर्डतोड़ गर्मी ने देश के 1.1 लाख करोड़ रुपये के सॉफ्ट ड्रिंक्स बाजार का गणित ही बदल दिया है। किराना दुकानों के फ्रिज और क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर कोल्ड ड्रिंक्स के साथ छाछ, लस्सी और प्रोबायोटिक ड्रिंक्स ने जबरदस्त जगह बना ली है। यह बदलाव खासकर युवा उपभोक्ताओं और शहरी घरों में दिख रहा है, जो कार्बोनेटेड ड्रिंक्स के बजाय हेल्थ और प्रोटीन-आधारित डेयरी बेवरेज को तरजीह दे रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि देशी उत्पादों का जलवा अब लौट आया है और विदेशी कोल्ड ड्रिंक कंपनियों की बादशाहत को सीधी चुनौती मिल रही है।

आईएमएआरसी के आंकड़ों के अनुसार, सॉफ्ट ड्रिंक्स का मौजूदा बाजार 111.81 हजार करोड़ रुपये का है, जो सालाना 4.64 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। वहीं, लस्सी का बाजार 5.60 हजार करोड़ से बढ़कर 24.57 हजार करोड़ और छाछ का बाजार 19.33 हजार करोड़ से बढ़कर 101.18 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। लस्सी की सालाना वृद्धि दर 16.96 प्रतिशत और छाछ की 18.16 प्रतिशत है। यानी देसी बेवरेज की बिक्री चौगुनी रफ्तार से बढ़ रही है, जबकि कोल्ड ड्रिंक्स की ग्रोथ एकल अंक में सिमट गई है। मदर डेयरी के मैनेजिंग डायरेक्टर जयतीर्थ चारी के मुताबिक, इस सीजन लस्सी और छाछ जैसे डेयरी उत्पादों ने 40 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की है। क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी डबल डिजिट ग्रोथ देखने को मिल रही है।

लस्सी और छाछ की बिक्री बढ़ने की सबसे बड़ी वजह टैक्स का अंतर है। कार्बोनेटेड ड्रिंक्स पर 40 प्रतिशत जीएसटी है, जबकि डेयरी बेवरेज पर केवल 5 प्रतिशत जीएसटी लगता है। इस 35 प्रतिशत के अंतर के कारण डेयरी कंपनियां 10 रुपये का उत्पाद भी आसानी से बेच पा रही हैं। दूसरी वजह हेल्थ और न्यूट्रिशन है। कोविड के बाद उपभोक्ता स्वाद के साथ सेहत भी चाहते हैं। लस्सी, छाछ, प्रोबायोटिक और लो-शुगर पेय हेल्दी विकल्प बन गए हैं। युवा वर्ग अब अधिक शुगर और आर्टिफिशियल फ्लेवर से दूरी बना रहा है। तीसरी वजह मॉडर्न और ट्रेडिशनल का संगम है। हाइजेनिक पैकेजिंग के साथ कोकम, जलजीरा, आम पना और छाछ जैसे पेयों की बाजार में दोबारा एंट्री हुई है। अमूल, मदर डेयरी, पराग और हेरिटेज फूड्स जैसी कंपनियां पुदीना छाछ, प्रोबायोटिक छाछ और प्रोटीन लस्सी जैसे नए वैरिएंट 10 रुपये की शुरुआती कीमत पर ला रही हैं।

हेरिटेज फूड्स के सीईओ श्रीदीप केसवन का कहना है कि कंपनी के राजस्व में डेयरी बेवरेज का योगदान पिछले तीन वर्षों में दोगुना हो चुका है। पराग मिल्क फूड्स की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अक्षाली शाह के अनुसार, भारत की पैकेज्ड फूड एवं बेवरेज इंडस्ट्री 9.51 लाख करोड़ रुपये की है, जो 2030 तक 14.27 लाख करोड़ रुपये की हो जाएगी। डेयरी ड्रिंक्स बाजार 2031 तक 4.23 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। इसी कारण कंपनियां प्रोटीन, हेल्थ और वेलनेस आधारित उत्पादों पर फोकस कर रही हैं। पराग के इस कारोबार में सालाना आधार पर 109 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। मदर डेयरी ने अवतार प्रोटीन कोल्ड कॉफी लॉन्च की है, जिसमें 15 ग्राम प्रोटीन है और जिसे स्वाद व पोषण दोनों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

शहरी युवा अब ब्रांड की चमक से ज्यादा न्यूट्रिशन लेबल पढ़ता है। जिम जाने वाले युवाओं के लिए 20 ग्राम प्रोटीन वाली लस्सी, कोल्ड ड्रिंक से बेहतर विकल्प बन रही है। ऑफिस जाने वाले लोग दोपहर में भारी-भरकम कोल्ड ड्रिंक की जगह छाछ को चुन रहे हैं, क्योंकि इससे एसिडिटी नहीं होती और पेट भी हल्का रहता है। गर्मी में नमक और जीरे वाली छाछ शरीर को डिहाइड्रेशन से बचाने में मदद करती है। यही वजह है कि कॉलेज कैंटीन से लेकर कॉरपोरेट कैफेटेरिया तक अब देशी बेवरेज की मांग बढ़ रही है। सोशल मीडिया पर भी लस्सी और छाछ को 'कूल ड्रिंक' के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। रील्स और शॉर्ट्स में 'देसी स्वैग' का नया ट्रेंड बन गया है।

देशी बेवरेज की मांग बढ़ने से सीधा फायदा डेयरी किसानों को हो रहा है। दूध की खपत बढ़ने से गांवों में पशुपालकों की आय बढ़ी है। सहकारी समितियां अब छाछ, लस्सी और फ्लेवर्ड मिल्क की यूनिट लगा रही हैं। इससे गांवों में ही रोजगार पैदा हो रहा है और शहरों की ओर पलायन भी घट रहा है। एक लीटर छाछ बनाने में करीब 400 मिलीलीटर दूध लगता है। इस तरह डेयरी सेक्टर की वृद्धि तेज हुई है। सरकार की डेयरी विकास योजनाओं को भी इससे बल मिला है।

विदेशी कोल्ड ड्रिंक ब्रांड अब नई रणनीति बना रहे हैं। शुगर-फ्री वैरिएंट लॉन्च किए जा रहे हैं और स्थानीय फ्लेवर जोड़ने की कोशिश हो रही है। लेकिन 40 प्रतिशत जीएसटी और बढ़ती हेल्थ अवेयरनेस के चलते उनकी राह आसान नहीं है। कुछ कंपनियां अब जूस और डेयरी सेगमेंट में भी उतर रही हैं, ताकि बाजार में अपनी मौजूदगी बनाए रख सकें। हालांकि भारतीय स्वाद और भरोसा जीतना उनके लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि लस्सी और छाछ पीढ़ियों से घर-घर में बनती रही हैं और अब वही स्वाद हाइजेनिक पैकेजिंग में उपलब्ध है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह ट्रेंड अस्थायी नहीं है। आने वाले पांच वर्षों में डेयरी बेवरेज का बाजार कोल्ड ड्रिंक के बराबर पहुंच सकता है। फूड सेफ्टी मानकों और कोल्ड चेन के मजबूत होने से टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी इसकी पहुंच बढ़ेगी। स्टार्टअप भी नवाचार कर रहे हैं। बाजरे की छाछ, रागी की लस्सी और ओट्स आधारित ड्रिंक्स जैसे उत्पाद बाजार में आ रहे हैं। सरकार यदि डेयरी उत्पादों पर जीएसटी 5 प्रतिशत ही बनाए रखती है और प्रोसेसिंग यूनिट को सब्सिडी देती है, तो भारत वैश्विक डेयरी बेवरेज हब बन सकता है।

देशी उत्पादों का जलवा फिर से लौट आया है। कोल्ड ड्रिंक के प्रति भारतीयों की घटती पसंद ने साबित कर दिया है कि स्वाद, सेहत और जेब—इन तीनों के संतुलन पर ही बाजार टिकता है। लस्सी और छाछ ने सिर्फ गर्मी ही नहीं मिटाई, बल्कि विदेशी ब्रांड्स के वर्चस्व को भी चुनौती दे दी है। यह आत्मनिर्भर भारत की सशक्त तस्वीर है, जहां दादी-नानी के नुस्खे अब आधुनिक पैकेजिंग में दुनिया जीतने की ओर बढ़ रहे हैं।

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