भोपाल, 4 जुलाई।
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक 20 जुलाई से प्रारंभ हो रहे विधानसभा के मानसून सत्र में प्रस्तुत किया जाएगा। इसमें आदिवासियों के साथ-साथ मतांतरित आदिवासियों को भी कानून के दायरे से बाहर रखा जा सकता है। इस विषय को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली समिति को जन-परामर्श के दौरान बड़ी संख्या में सुझाव मिले हैं।
एक पक्ष का तर्क है कि जब कोई आदिवासी मतांतरित हो गया, तो उसे आदिवासियों को मिलने वाले विशेष अधिकारों और सुविधाओं से वंचित रखा जाना चाहिए। सैद्धांतिक रूप से सभी व्यवस्थाओं का कानूनी अध्ययन कर समिति सरकार को अपनी अनुशंसा देगी। समिति ने इस विषय पर विस्तृत विचार-विमर्श किया है और कानूनी पहलुओं का भी अध्ययन किया है।
दरअसल, समान नागरिक संहिता का उद्देश्य सभी धर्मों के नागरिकों पर समान रूप से लागू होने वाला पारिवारिक कानून बनाना है। वर्तमान में यह गोवा और उत्तराखंड में लागू है। गोवा में पुर्तगाली शासन के समय से ही समान पारिवारिक कानून प्रभावी है, जो विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे मामलों में सभी धर्मों के नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है।
समिति को प्रदेश भर से हजारों सुझाव मिले हैं। इनमें सबसे अधिक मांग आदिवासी समाज को यूसीसी से बाहर रखने की है। तर्क दिया गया है कि संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची आदिवासी समाज को विशेष दर्जा देती है। उनकी अपनी परंपराएं, रूढ़ियां और स्वशासी व्यवस्थाएं हैं। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति के मामलों में उनकी अपनी व्यवस्थाएं सदियों से चली आ रही हैं। यदि समान नागरिक संहिता लागू होती है, तो उनकी सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो सकती है।
अब नया सवाल मतांतरित आदिवासियों को लेकर उठा है। कई संगठनों का कहना है कि जो व्यक्ति ईसाई, इस्लाम या किसी अन्य धर्म को अपना लेता है, वह सांस्कृतिक रूप से आदिवासी ही रहता है। उसकी भाषा, रहन-सहन और सामुदायिक संबंध वही रहते हैं। केवल धर्म बदलने से उसकी आदिवासी पहचान समाप्त नहीं होती। इसलिए उसे भी यूसीसी से बाहर रखा जाना चाहिए।
दूसरी ओर कुछ संगठनों का तर्क है कि जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करता है, तो वह उस धर्म के पर्सनल लॉ को भी स्वीकार करता है। ऐसे में उसे आदिवासी दर्जे के विशेष अधिकार नहीं मिलने चाहिए, क्योंकि इससे दोहरा लाभ मिलेगा। एक ओर वह नए धर्म की व्यवस्था का लाभ लेगा और दूसरी ओर आदिवासी आरक्षण तथा अन्य छूट भी प्राप्त करेगा।
संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को समान नागरिक संहिता बनाने का निर्देश देता है, जबकि अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति और शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा का अधिकार देते हैं। वहीं, पांचवीं अनुसूची के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वे किसी कानून को आदिवासी क्षेत्रों में लागू होने से रोक सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार कह चुका है कि आदिवासी रीति-रिवाजों को कानून से संरक्षण मिलना चाहिए।
मतांतरण के बाद आदिवासी दर्जे पर सर्वोच्च न्यायालय का रुख भी महत्वपूर्ण है। 2004 के एक निर्णय में न्यायालय ने कहा था कि केवल धर्म बदलने से व्यक्ति की जनजातीय पहचान समाप्त नहीं होती, जब तक वह अपनी जनजातीय परंपराओं को न छोड़ दे। लेकिन यदि वह नए धर्म की परंपराओं को पूरी तरह अपना ले और अपनी पुरानी परंपराओं से नाता तोड़ ले, तो स्थिति अलग हो सकती है।
समस्या यह है कि जमीनी स्तर पर मतांतरण का स्वरूप एक जैसा नहीं है। कहीं पूरा गांव धर्म बदल लेता है, लेकिन सरहुल और करम जैसे पारंपरिक त्योहार मनाता रहता है। कहीं व्यक्ति केवल धर्म बदलता है, लेकिन विवाह और अन्य सामाजिक संस्कार आदिवासी रीति-रिवाजों से ही करता है। ऐसे में यह तय करना कठिन है कि किसने वास्तव में अपनी परंपरा छोड़ी और किसने नहीं।
यदि मतांतरित आदिवासियों को यूसीसी से बाहर रखा जाता है, तो भविष्य में यह मांग भी उठ सकती है कि उन्हें आरक्षण सहित अन्य सभी विशेष अधिकार भी मिलते रहें। इससे सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर यदि उन्हें बाहर नहीं रखा जाता, तो आरोप लगेगा कि राज्य उनकी सांस्कृतिक पहचान छीन रहा है।
समाधान यह हो सकता है कि यूसीसी में आदिवासी समाज के लिए अलग अध्याय जोड़ा जाए, जिसमें उनकी परंपराओं और रूढ़ियों को मान्यता दी जाए। मतांतरण के मामलों की जांच के लिए जिला स्तर पर समिति गठित की जाए, जो यह देखे कि व्यक्ति ने वास्तव में अपनी पारंपरिक जीवनशैली छोड़ी है या नहीं। साथ ही जनजातीय सलाहकार परिषद को अधिक प्रभावी बनाया जाए और कोई भी निर्णय उसकी सहमति के बाद ही लागू किया जाए।
समान नागरिक संहिता का उद्देश्य एक देश, एक कानून की व्यवस्था स्थापित करना है, लेकिन भारत विविधताओं का देश है। आदिवासी समाज की अपनी विशिष्ट पहचान है, जिसे संविधान ने संरक्षण दिया है। मतांतरित आदिवासियों का प्रश्न और भी जटिल है, क्योंकि यहां धर्म, संस्कृति और पहचान तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। सरकार को जल्दबाजी के बजाय समिति की अनुशंसाओं का इंतजार करना चाहिए और सभी पक्षों से व्यापक संवाद करना चाहिए। कानून तभी सफल होगा, जब वह थोपा हुआ नहीं, बल्कि विश्वास और सहमति के आधार पर लागू होगा। समानता का अर्थ एकरूपता नहीं, बल्कि सभी को समान अवसर देना और प्रत्येक समुदाय की पहचान का सम्मान करना है। यूसीसी की वास्तविक परीक्षा भी इसी कसौटी पर होगी।















