संपादकीय
04 Jul, 2026

डे-केयर सेंटर बने टॉर्चर सेल: डर का घर, मासूमों पर जुल्म की हद

बेंगलुरु के एक डे-केयर सेंटर में बच्चों के साथ सामने आए कथित दुर्व्यवहार ने सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी प्रणाली, जवाबदेही और बाल संरक्षण उपायों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बेंगलुरु, 4 जुलाई।

हे राम! इतनी अमानवीयता। यह शब्द नहीं, चीख है जो बेंगलुरु के कैपजेमिनी एचएएल कैंपस स्थित डे-केयर सेंटर से उठी है। दो से तीन साल के मासूम बच्चे, जिनकी तोतली बोली पर मां-बाप फिदा होते हैं, उन पर जो गुजरी, उसे देखकर रूह कांप जाती है। 29 जून को सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो किसी थ्रिलर फिल्म के दृश्य नहीं, बल्कि आईटी राजधानी की चमक के पीछे छिपी भयावह सच्चाई हैं। एक वीडियो में बच्चा टॉयलेट में बंद होकर बिलख रहा है और केयरगिवर उसका वीडियो बना रही है। दूसरे में बच्चे के चेहरे पर जेट स्प्रे से पानी मारा जा रहा है। एक मासूम को वॉशिंग मशीन के ड्रम में बैठाकर डराया जा रहा है। यह खेल नहीं, यातना है; यह बाल उत्पीड़न की भयावह तस्वीर है।

सवाल यह है कि इन बच्चों का कसूर क्या था? रोना क्या गुनाह है? जिद करना क्या अपराध है? अगर दो साल का बच्चा रोएगा नहीं तो क्या इस्तीफा लिखेगा? यह सब एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के कैंपस में हो रहा था, जहां कर्मचारी कल्याण के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। पुलिस ने पांच महिला केयरगिवर्स के खिलाफ मामला दर्ज किया है, लेकिन सवाल केवल पांच लोगों पर नहीं, पूरे सिस्टम पर है। एक पूर्व कर्मचारी ने पहले ही प्रबंधन को इसकी जानकारी दी थी, लेकिन कार्रवाई करने के बजाय उसे नौकरी से निकाल दिया गया। यह अमानवीयता की दूसरी परत है।

नोएडा, गुरुग्राम, पुणे और अन्य शहरों से भी डे-केयर में बच्चों के साथ मारपीट की खबरें आती रही हैं। मां-बाप मजबूरी में बच्चों को डे-केयर में छोड़ते हैं और भरोसा करते हैं कि उनका बच्चा सुरक्षित रहेगा। लेकिन जब रखवाले ही दरिंदे बन जाएं तो भरोसा किस पर किया जाए? जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 की धारा 75 बच्चों के साथ क्रूरता पर कठोर सजा का प्रावधान करती है, लेकिन सवाल केवल सजा का नहीं, रोकथाम का है।

क्या हर डे-केयर में अभिभावकों को सीसीटीवी का लाइव एक्सेस मिलता है? क्या महिला एवं बाल विकास विभाग नियमित निरीक्षण करता है? क्या केयरगिवर्स का पुलिस सत्यापन और मनोवैज्ञानिक परीक्षण अनिवार्य है? यदि नहीं, तो ऐसी घटनाएं कैसे रुकेंगी? डे-केयर आज सेवा से अधिक व्यवसाय बन चुके हैं। सीमित जगह में जरूरत से ज्यादा बच्चों को रखा जाता है, कम वेतन और बिना प्रशिक्षण वाले कर्मचारियों से संवेदनशील जिम्मेदारी निभाने की उम्मीद की जाती है। ऐसे में सबसे ज्यादा नुकसान उस बच्चे को होता है, जो अपनी पीड़ा कह भी नहीं सकता।

यह मामला केवल कैपजेमिनी का नहीं, बल्कि उस सोच का है, जहां बच्चे को जिम्मेदारी नहीं, बोझ समझा जाता है। दोषियों पर त्वरित सुनवाई हो, कंपनी की जवाबदेही भी तय हो और डे-केयर सेंटरों के लिए सख्त नियमन लागू किया जाए। अभिभावकों को भी केवल सुविधाएं नहीं, सुरक्षा व्यवस्था, स्टाफ और निगरानी प्रणाली की जानकारी अवश्य लेनी चाहिए।

यह घटना समाज के मुंह पर तमाचा है। हम तकनीक में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन मासूम बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रहे। यदि अब भी नहीं चेते तो भरोसा, संवेदना और इंसानियत—तीनों हार जाएंगे। बेंगलुरु की यह घटना पूरे देश के लिए चेतावनी है कि डे-केयर के नाम पर चल रहे ऐसे यातना गृहों पर तत्काल लगाम लगाई जाए, क्योंकि जो समाज अपने बच्चों की रक्षा नहीं कर सकता, वह सच्ची तरक्की का दावा भी नहीं कर सकता।

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