भोपाल, 4 जुलाई।
दो साल पहले देश ने आपराधिक न्याय प्रणाली को बदलने वाले तीन नए कानून—भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम—लागू किए। कहा गया था कि इन कानूनों का उद्देश्य दंड के बजाय न्याय पर अधिक जोर देना है और इससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनेगी। लेकिन दो साल बाद स्थिति यह है कि जांच अधिकारी अभी तक नए प्रावधानों के साथ पूरी तरह सहज नहीं हो पाए हैं। यही इसकी सबसे कमजोर कड़ी भी बनती जा रही है। मौके पर वीडियो रिकॉर्डिंग और डिजिटल जब्ती अब अनिवार्य है, लेकिन नए कानूनों की असली ताकत थानों का तकनीकी ढांचा आज भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है। डीसीपी मुख्यालय श्रद्धा तिवारी ने भी माना कि गंभीर मामलों में जरा-सी चूक पुलिस की साख पर सवाल खड़े कर देती है।
नए कानून लागू होने के दो साल बाद भी पुलिस प्रशासन आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाया है। 2024 से अब तक 19,599 ई-एफआईआर दर्ज हुई हैं। एक जुलाई से 800 टैबलेट मिलने थे, लेकिन अब तक केवल 600 ही उपलब्ध कराए गए हैं। श्रद्धा तिवारी ने बताया कि नए कानून में गवाहों के बयान और डिजिटल साक्ष्य का महत्व बढ़ गया है, लेकिन पुलिस के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। इंटरनेट की सीमित उपलब्धता के कारण काम प्रभावित होता है। ऐसे में विवेचना अधिकारियों को अपने निजी मोबाइल फोन पर ई-साक्ष्य एप चलाकर काम करना पड़ रहा है। कुछ जांच अधिकारियों ने बताया कि डिजिटल डेटा को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक सीडी और पेन ड्राइव जैसे साधन भी उन्हें स्वयं खरीदने पड़ते हैं।
55 जिलों में केवल पांच ई-एफआईआर ही भोपाल में एफआईआर में बदली गईं। 5,843 मामलों में ही असल कायमी हो सकी। 4,290 ई-एफआईआर दर्ज की गईं, लेकिन उनमें से केवल 324 को ही एफआईआर में बदला गया।
नए कानूनों का मकसद न्याय को तेज और पारदर्शी बनाना था, लेकिन जमीन पर हालात अलग हैं। जांच अधिकारी खुद नए प्रावधानों में उलझे हुए हैं। पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 302 याद थी, अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 देखनी पड़ती है। धाराएं बदल गईं, प्रक्रिया बदल गई, लेकिन प्रशिक्षण उतना नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। नतीजा यह है कि एफआईआर दर्ज करने से लेकर आरोप पत्र दाखिल करने तक में देरी हो रही है।
सबसे बड़ी परेशानी डिजिटल साक्ष्य की है। नए कानून में घटनास्थल की वीडियोग्राफी, मोबाइल जब्ती की डिजिटल हैश वैल्यू और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को मूल साक्ष्य माना गया है, लेकिन थानों में न तो पर्याप्त टैबलेट हैं, न बॉडी कैमरे और न ही डेटा स्टोरेज की समुचित सुविधा। पुलिसकर्मी अपने निजी मोबाइल से वीडियो बनाते हैं और बाद में सवाल उठता है कि साक्ष्य सुरक्षित है या नहीं।
आंकड़े बताते हैं कि 19,599 ई-एफआईआर में से केवल 5,843 में ही असल कायमी हो पाई है। यानी लगभग 70 प्रतिशत मामले अभी भी शुरुआती चरण में अटके हुए हैं। 4,290 ई-एफआईआर दर्ज हुईं, लेकिन केवल 324 को ही एफआईआर में बदला गया। यह बताता है कि डिजिटल से भौतिक प्रक्रिया में परिवर्तन ही बेहद धीमा है। वजह साफ है—जांच अधिकारी के पास न पर्याप्त टैबलेट हैं, न प्रशिक्षित स्टाफ और न ही पर्याप्त इंटरनेट सुविधा।
55 जिलों में केवल पांच ई-एफआईआर ही भोपाल में एफआईआर में बदली गईं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि बड़े शहरों को छोड़कर बाकी जिलों में डिजिटल जांच का बुनियादी ढांचा अभी खड़ा ही नहीं हो पाया है। ग्रामीण थानों में स्थिति और भी खराब है। वहां न पर्याप्त नेटवर्क है, न नियमित बिजली और न ही आधुनिक कंप्यूटर।
कानून बदलने के साथ सबसे जरूरी था कि हर स्तर के जांच अधिकारी को नए प्रावधानों का गहन प्रशिक्षण दिया जाता, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश प्रशिक्षण केवल पीपीटी तक सीमित रहे। फील्ड में जाकर ई-साक्ष्य एप कैसे चलाना है, हैश वैल्यू कैसे निकालनी है और क्लाउड पर डेटा कैसे अपलोड करना है, यह बहुत कम अधिकारियों को आता है। नतीजा यह है कि तकनीकी त्रुटियों के कारण मजबूत मामले भी अदालत में कमजोर पड़ जाते हैं।
संसाधन उपलब्ध कराना सबसे पहली जरूरत है। हर थाने को पर्याप्त टैबलेट, बॉडी कैमरा, हाई-स्पीड इंटरनेट और सुरक्षित सर्वर उपलब्ध कराना होगा। 800 टैबलेट में से केवल 600 ही मिले हैं और वे भी जिला मुख्यालयों तक सीमित हैं। यह संख्या बढ़ाकर हर जांच अधिकारी तक पहुंचानी होगी। निरंतर प्रशिक्षण भी जरूरी है। कानून एक बार पढ़ लेने से याद नहीं होते। हर तीन महीने में रिफ्रेशर कोर्स हों, केस स्टडी के माध्यम से धाराओं का अभ्यास कराया जाए और डिजिटल टूल्स का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाए।
हर जिले में साइबर विशेषज्ञों की टीम हो, जो जांच अधिकारियों को मौके पर सहायता दे, डेटा सुरक्षित रखे और अदालत में साक्ष्य प्रस्तुत करने में सहयोग करे। ई-एफआईआर से एफआईआर में बदलने की प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन और स्वचालित हो, ताकि फाइलों के अटकने की गुंजाइश न रहे। संसाधन उपलब्ध कराने के बाद भी यदि डिजिटल साक्ष्य संग्रह में लापरवाही हो तो जिम्मेदारी तय की जाए और आवश्यक कार्रवाई भी हो।
कानून समाज की जरूरत के अनुसार बदलते हैं, लेकिन केवल किताब में धाराएं बदल देने से न्याय नहीं मिलता। न्याय तब मिलता है, जब जांच अधिकारी को नई धाराएं अच्छी तरह समझ आएं, उसके पास आवश्यक संसाधन हों, डेटा सुरक्षित रहे और वह तकनीक से डरने के बजाय उसका प्रभावी उपयोग कर सके।
नए कानूनों का उद्देश्य पीड़ित को शीघ्र न्याय दिलाना है, लेकिन जब जांच ही उलझन में फंसी हो तो न्याय कैसे मिलेगा? इसलिए व्यवस्था को भी उतनी ही तेजी से बदलना होगा, जितनी तेजी से कानून बदले हैं। भवन वही है तो कम से कम फर्नीचर तो नया होना ही चाहिए। अपने ही कानून और नियमों को समझने में परेशान जांच अधिकारियों के लिए धाराओं के साथ-साथ व्यवस्था और संसाधनों में भी बदलाव जरूरी है। समय के साथ बदलती जरूरतों को पूरा करने से ही न्यायिक व्यवस्था को सफलता मिलेगी। यदि आज तकनीक, प्रशिक्षण और संसाधनों पर निवेश किया जाएगा तो कल अदालतों में 'तारीख पर तारीख' नहीं, बल्कि पीड़ित को समय पर न्याय मिलेगा और पुलिस की साख भी बढ़ेगी। वरना नए कानून भी पुरानी फाइलों में दबकर रह जाएंगे और जनता का भरोसा फिर टूट जाएगा। बदलाव केवल कानून में नहीं, सोच में भी चाहिए, और सोच तभी बदलेगी जब हाथ में सही औजार होगा।















