नई दिल्ली, 10 जुलाई।
भारत की वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने ऑस्ट्रेलिया के आईपी ऑस्ट्रेलिया को ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) तक पहुंच उपलब्ध कराने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने शुक्रवार को बताया कि यह समझौता मेलबर्न में आयोजित भारत-ऑस्ट्रेलिया तीसरे वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान संपन्न हुआ।
मंत्रालय के अनुसार, टीकेडीएल एक्सेस एग्रीमेंट शिखर सम्मेलन के 18 प्रमुख परिणामों में शामिल है। इसके तहत आईपी ऑस्ट्रेलिया पेटेंट आवेदनों की जांच के दौरान ऑस्ट्रेलिया के पेटेंट कानूनों और प्रक्रिया के अनुरूप पूर्व उपलब्ध ज्ञान की पहचान करने के लिए इस डेटाबेस का उपयोग कर सकेगा।
यह समझौता भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज की मौजूदगी में हुआ। ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी दुनिया का अपनी तरह का पहला प्रायर आर्ट डेटाबेस है, जिसे भारत ने अपने समृद्ध पारंपरिक ज्ञान को गलत तरीके से पेटेंट किए जाने से बचाने के उद्देश्य से विकसित किया है।
सरकार का कहना है कि इस समझौते से पेटेंट जांच प्रक्रिया अधिक सटीक और प्रभावी बनेगी। साथ ही भारत की पारंपरिक विरासत में पहले से दर्ज ज्ञान पर अनुचित या गलत पेटेंट दिए जाने की संभावना भी कम होगी। भारत और ऑस्ट्रेलिया, दोनों देशों के पास समृद्ध स्वदेशी ज्ञान परंपराएं, पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां और सांस्कृतिक विरासत मौजूद हैं, जिनके दुरुपयोग की आशंका को देखते हुए यह समझौता महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यह समझौता पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा और बौद्धिक संपदा व्यवस्था को मजबूत करने की दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है। सीएसआईआर-टीकेडीएल का विकास विशेष रूप से इस उद्देश्य से किया गया था कि भारतीय पारंपरिक ज्ञान के आधार पर गलत तरीके से पेटेंट जारी न किए जा सकें।
वर्तमान में सीएसआईआर-टीकेडीएल में आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, सोवा रिग्पा और योग से जुड़ी 5.2 लाख से अधिक औषधीय विधियों और पारंपरिक प्रथाओं का विस्तृत विवरण उपलब्ध है। इसका अनुवाद अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, जापानी और स्पेनिश सहित पांच अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में किया गया है, ताकि दुनिया भर के पेटेंट परीक्षक इसका उपयोग कर सकें। इस समझौते के बाद अब दुनिया के 18 पेटेंट कार्यालयों को गोपनीयता समझौते के तहत इस डेटाबेस तक पहुंच मिल चुकी है, जिससे भारतीय पारंपरिक ज्ञान की वैश्विक सुरक्षा और मजबूत होगी।












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