नई दिल्ली, 14 जुलाई।
शिक्षा मंत्रालय ने यूडीआईएसई प्लस 2025-26 की रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में देश की स्कूली शिक्षा की तस्वीर के दो पहलू सामने आए हैं। एक तरफ आंकड़े बताते हैं कि स्कूलों की संख्या बढ़ी है, शिक्षक भर्ती हुए हैं और बुनियादी सुविधाएं सुधरी हैं। दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि सीखने का स्तर अब भी चिंता का विषय बना हुआ है। आंकड़ों की चमक और कक्षा की वास्तविकता में अंतर साफ दिखाई देता है।
देश में 14.67 लाख स्कूल हैं। इन स्कूलों में 24.72 करोड़ बच्चे पढ़ रहे हैं। इनमें 12.75 करोड़ लड़के और 11.96 करोड़ लड़कियां शामिल हैं। देशभर में 1.02 करोड़ शिक्षक कार्यरत हैं। यानी औसतन हर 24 छात्रों पर एक शिक्षक है। यह अनुपात सुधार का संकेत है, क्योंकि पहले यह स्थिति और खराब थी। स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं भी बेहतर हुई हैं। 99.5 फीसदी स्कूलों में पीने का पानी उपलब्ध है, 95 फीसदी स्कूलों में बिजली है और 98.5 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय हैं।
सरकार ने पिछले दस वर्षों में स्कूल खोलने और शिक्षक भर्ती पर जोर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि नामांकन बढ़ा और ड्रॉपआउट दर घटी। प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 0.3 फीसदी, मिडिल स्तर पर 3.6 फीसदी और सेकेंडरी स्तर पर 9.5 फीसदी है। रिटेंशन रेट भी बेहतर हुआ है। प्राथमिक स्तर पर 91.1 फीसदी बच्चे अगली कक्षा तक पहुंच रहे हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो बच्चे स्कूल में टिक रहे हैं, क्या वे वास्तव में सीख भी रहे हैं? राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण और अन्य आकलन बताते हैं कि कक्षा पांच का बच्चा कक्षा दो की किताब सहजता से नहीं पढ़ पाता और कक्षा आठ का छात्र साधारण गणित के सवाल हल नहीं कर पाता। इसका अर्थ साफ है कि स्कूल में प्रवेश तो हो रहा है, लेकिन सीखने की प्रक्रिया कमजोर बनी हुई है।
हर 24 छात्रों पर एक शिक्षक का अनुपात कागज पर संतोषजनक लगता है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह औसत वास्तविक तस्वीर नहीं दिखाता। कई स्कूलों में एक ही शिक्षक 60 से 70 बच्चों को पढ़ा रहा है, जबकि अनेक स्कूलों में विषय विशेषज्ञ शिक्षक ही नहीं हैं। विज्ञान, गणित और अंग्रेजी के शिक्षकों की सबसे अधिक कमी है। एक शिक्षक को कई विषय पढ़ाने पड़ते हैं और साथ ही मध्यान्ह भोजन, जनगणना, चुनाव ड्यूटी तथा अन्य प्रशासनिक कार्य भी करने पड़ते हैं। ऐसे में पढ़ाई पर पूरा ध्यान कैसे दिया जा सकता है?
समस्या शिक्षक प्रशिक्षण की भी है। नई शिक्षा नीति और बदलते पाठ्यक्रम के अनुरूप शिक्षकों को पर्याप्त रूप से तैयार नहीं किया जा रहा। अनेक शिक्षक आज भी पुराने तरीकों से पढ़ा रहे हैं। स्मार्ट क्लास और डिजिटल शिक्षा की बातें तो होती हैं, लेकिन ग्रामीण स्कूलों में इंटरनेट और डिजिटल संसाधन अब भी सीमित हैं। रिपोर्ट यह जरूर बताती है कि अधिकांश स्कूलों में पानी और बिजली की सुविधा है, लेकिन यह नहीं बताती कि पानी नियमित मिलता है या नहीं, बिजली लगातार रहती है या नहीं और शौचालय उपयोग योग्य एवं स्वच्छ हैं या नहीं।
उत्तर प्रदेश में 4.27 करोड़ विद्यार्थी और 16.42 लाख शिक्षक हैं। यहां 2.65 लाख स्कूल हैं। महाराष्ट्र में 2.16 करोड़ विद्यार्थी और 7.50 लाख शिक्षक हैं। बिहार में 2.06 करोड़ विद्यार्थी और 7.28 लाख शिक्षक, राजस्थान में 1.59 करोड़ विद्यार्थी और 7.93 लाख शिक्षक तथा मध्य प्रदेश में 1.52 करोड़ विद्यार्थी और 7.29 लाख शिक्षक हैं। देश के आधे से अधिक विद्यार्थी इन्हीं बड़े राज्यों में पढ़ते हैं, इसलिए यहां सुधार का अर्थ पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार होगा।
प्राथमिक स्तर पर स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, लेकिन जैसे-जैसे कक्षाएं ऊंची होती हैं, बच्चे स्कूल छोड़ने लगते हैं। 11वीं और 12वीं तक केवल 78.1 फीसदी विद्यार्थी ही पहुंच पाते हैं। लड़कियों की स्थिति कुछ बेहतर जरूर हुई है, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों और घरेलू जिम्मेदारियों के कारण वे भी पढ़ाई बीच में छोड़ देती हैं। इसका कारण केवल गरीबी नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता भी है। जब अभिभावकों को लगता है कि स्कूल में बच्चा अपेक्षित सीख नहीं पा रहा, तो वे उसे काम पर लगा देते हैं या निजी कोचिंग का खर्च नहीं उठा पाते।
नई शिक्षा नीति 2020 ने फाउंडेशनल लर्निंग पर विशेष जोर दिया है। निपुण भारत मिशन के माध्यम से कक्षा तीन तक हर बच्चे को पढ़ना, लिखना और बुनियादी गणित सिखाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए आंगनवाड़ी और प्री-स्कूल व्यवस्था को भी मजबूत किया जा रहा है। लेकिन नीति और जमीन के बीच का अंतर अब भी स्पष्ट है। शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण, स्कूलों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सामग्री और मूल्यांकन प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है। जब तक परीक्षा रटने पर आधारित रहेगी, तब तक बच्चे अंक तो ले आएंगे, लेकिन ज्ञान अर्जित नहीं कर पाएंगे।
यूडीआईएसई की रिपोर्ट बताती है कि स्कूलों और शिक्षकों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। अब आवश्यकता संख्या से आगे बढ़कर गुणवत्ता पर ध्यान देने की है। 24 छात्रों पर एक शिक्षक का आंकड़ा तभी सार्थक होगा, जब वह शिक्षक नियमित रूप से पढ़ाए और गैर-शैक्षणिक कार्यों में न उलझे। यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है, तो उसकी मजबूत नींव स्कूलों में ही रखनी होगी। हर बच्चा केवल स्कूल पहुंचे ही नहीं, बल्कि वहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी प्राप्त करे। सरकार आंकड़े दे रही है, समाज उम्मीद कर रहा है और बच्चे देश का भविष्य हैं। अब यह सुनिश्चित करना होगा कि हर स्कूल केवल इमारत न रहे, बल्कि वास्तविक अर्थों में ज्ञान का मंदिर बने।

















