नई दिल्ली, 14 जुलाई।
देश में एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ कंपनियों के मुनाफे रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं, दूसरी तरफ आम आदमी की जेब हर दिन खाली हो रही है। बाजार में चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन तनख्वाह और आमदनी वहीं की वहीं है। तेल कंपनियों से लेकर एफएमसीजी तक कई बड़ी कंपनियों ने बीते वर्षों में 70 फीसदी तक का मुनाफा कमाया है, लेकिन इसका फायदा उपभोक्ता तक नहीं पहुंचा। उल्टे उसे हर चीज के लिए ज्यादा पैसे चुकाने पड़ रहे हैं।
क्रूड ऑयल का दाम गिरने पर भी राहत नहीं मिली। पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं घटीं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव 68 डॉलर प्रति बैरल था, तब भी कंपनियों ने कहा कि अभी दाम नहीं घटेंगे। जब यही भाव बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा, तब भी तर्क दिया गया कि लागत बढ़ गई है, इसलिए कीमतें बढ़ानी पड़ेंगी। पिछले 36 दिनों में कंपनियों ने प्रति लीटर 11 रुपये तक का मुनाफा कमाया, लेकिन उपभोक्ता को एक रुपये की भी राहत नहीं मिली। आईओसीएल, बीपीसीएल और एचपीसीएल जैसी सरकारी कंपनियों का मुनाफा 70 से 80 फीसदी तक बढ़ गया, लेकिन आम आदमी से वसूली जारी रही। कीमत तय करने का फार्मूला अब उपभोक्ता के हित में नहीं, बल्कि कंपनियों की बैलेंस शीट के हित में दिखाई देता है। जब क्रूड महंगा होता है तो दाम तुरंत बढ़ा दिए जाते हैं, लेकिन जब सस्ता होता है तो कीमतें घटाने के नाम पर चुप्पी साध ली जाती है। यही लूट का नया मॉडल बन गया है।
पेट्रोल-डीजल की महंगाई का असर हर चीज पर पड़ता है। सब्जी, दूध, दवा और किराया, सब परिवहन से जुड़े हैं। जब परिवहन महंगा होगा तो मंडी तक सब्जी भी महंगी पहुंचेगी, स्कूल बस का किराया बढ़ेगा और नौकरी पर जाने का खर्च भी बढ़ जाएगा। पिछले पांच वर्षों में वेतन उतना नहीं बढ़ा, जितनी महंगाई बढ़ी है। मध्यम वर्ग का परिवार अब महीने का बजट बनाते समय सबसे पहले खाने-पीने और बच्चों की शिक्षा में कटौती करता है, क्योंकि बिजली का बिल, गैस सिलेंडर और पेट्रोल का खर्च कम नहीं किया जा सकता। कंपनियां तिमाही नतीजों में अरबों का मुनाफा दिखा रही हैं और दूसरी तरफ वही परिवार महीने के अंत में कर्ज मांगने को मजबूर है।
यह सिर्फ तेल कंपनियों की कहानी नहीं है। साबुन, तेल, आटा, बिस्किट और दवा बनाने वाली कंपनियां भी इसी रास्ते पर चल रही हैं। पैकेट का आकार छोटा कर दिया गया, लेकिन दाम वही रखे गए। इसे 'श्रिंकफ्लेशन' कहा जाता है। उपभोक्ता को लगता है कि कीमत नहीं बढ़ी, जबकि उसे पहले से कम सामान मिल रहा है। दवाओं की कीमतों पर भी प्रभावी नियंत्रण नहीं है। एक ही साल्ट की दवा अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग कीमत पर बेच रही हैं। डॉक्टर कंपनी का ब्रांड लिख देते हैं और मरीज को वही महंगी दवा खरीदनी पड़ती है। जेनेरिक दवाएं सस्ती हैं, लेकिन उन्हें बाजार में पर्याप्त बढ़ावा नहीं मिलता, क्योंकि उनमें कंपनियों का मुनाफा कम होता है।
सरकार भी इस व्यवस्था में बराबर की हिस्सेदार दिखाई देती है। पेट्रोल-डीजल पर केंद्र और राज्य, दोनों भारी टैक्स वसूलते हैं। जब कच्चा तेल सस्ता होता है तो टैक्स बढ़ाकर राजस्व की भरपाई कर ली जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि कंपनी भी कमा रही है और सरकार भी, जबकि बीच में उपभोक्ता पिस रहा है। बैंकों और फिनटेक कंपनियों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। कर्ज पर ब्याज दर बढ़ा दी जाती है, लेकिन जमा राशि पर ब्याज उसी अनुपात में नहीं बढ़ता। क्रेडिट कार्ड पर 40 फीसदी तक ब्याज वसूला जा रहा है। डिजिटल इंडिया के दौर में भी विभिन्न सेवाओं के नाम पर उपभोक्ता से लगातार शुल्क वसूला जा रहा है।
इसका सबसे बड़ा कारण प्रतिस्पर्धा का अभाव है। ज्यादातर जरूरी क्षेत्रों पर कुछ बड़ी कंपनियों का कब्जा है। तेल, सीमेंट और दवा जैसे क्षेत्रों में मुट्ठीभर कंपनियां बाजार की दिशा तय करती हैं। जब प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी तो कंपनियां कीमत घटाने के बजाय मुनाफा बढ़ाने पर ही ध्यान देंगी। दूसरी समस्या निगरानी की कमजोरी है। उपभोक्ता संरक्षण से जुड़ी संस्थाएं घोषणाएं तो करती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रभावी निगरानी नहीं दिखती। श्रिंकफ्लेशन को रोकने के लिए ठोस नियमों का अभाव है और एमआरपी से अधिक वसूली की शिकायतें भी लगातार सामने आती रहती हैं।
जब आम आदमी की जेब कटती है तो वह खर्च कम करता है। खर्च घटने से मांग घटती है, मांग घटने से उत्पादन प्रभावित होता है और अंततः रोजगार पर असर पड़ता है। यानी कंपनियों का अल्पकालिक मुनाफा देश की दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि को नुकसान पहुंचा सकता है। गांव में किसान डीजल महंगा होने से ट्रैक्टर कम चला रहा है, शहर में ऑटो चालक सवारी कम कर रहा है और घरों में लोग बिजली बचाने के लिए मजबूरी में एसी-पंखे कम चला रहे हैं। यह बचत नहीं, बल्कि घटती क्रय-शक्ति का संकेत है।
जरूरत पारदर्शिता, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और संतुलित कर व्यवस्था की है। तेल कंपनियों को नियमित रूप से यह बताना चाहिए कि कच्चे तेल की कीमत के आधार पर ईंधन की वास्तविक कीमत क्या बनती है। जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा दिया जाए, पैकेट के आकार में बदलाव पर सख्त नियम लागू हों और पेट्रोल-डीजल पर कर ढांचे को अधिक तर्कसंगत बनाया जाए। विकास का अर्थ केवल जीडीपी और शेयर बाजार का बढ़ना नहीं, बल्कि आम आदमी का जीवन आसान होना भी है। कंपनियां कमाएं, लेकिन उपभोक्ता का विश्वास खोकर नहीं। सरकार ऐसी नीतियां बनाए, जिनमें मुनाफे के साथ न्याय भी सुनिश्चित हो। तभी देश का विकास संतुलित और टिकाऊ बन सकेगा।

















