संपादकीय
16 Jul, 2026

लड़ता पंजाब में कांग्रेस खुद से लड़ रही है: अंतर्कलह ने डुबोई 2022 की नैया, अब 2027 की तैयारी भी खतरे में

पंजाब कांग्रेस में बढ़ती अंतर्कलह और नेतृत्व संघर्ष वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन की एकजुटता और राजनीतिक संभावनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

चंडीगढ़, 16 जुलाई।

पंजाब की सियासत में एक पुरानी कहावत है कि यहां सरकारें सड़कों पर नहीं, बल्कि गुरुद्वारों और पंचायतों में बनती हैं। लेकिन 2022 के बाद कांग्रेस ने इस कहावत को मानो नए सिरे से लिख दिया है कि यहां सरकारें नहीं, बल्कि पार्टियां अपने ही घर में हारती हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पार्टी को उम्मीद थी कि आत्ममंथन होगा, संगठन मजबूत होगा और नेतृत्व एकजुट होकर आम आदमी पार्टी सरकार को घेरेगा। हुआ इसके उलट। चेहरे बदले, कमान बदली, समितियां बनीं, लेकिन आग बुझने के बजाय और भड़क गई। प्रभारी महासचिव भूपेश बघेल की मौजूदगी में हुई बंद कमरे की बैठक में जो कुछ हुआ, उसने कांग्रेस के 'लड़ता पंजाब' के नारे की हवा निकाल दी।

बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने सीधे प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग पर निशाना साधते हुए उनके इस्तीफे की मांग कर दी। जवाब में पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा ने चन्नी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और उन्हें 'कंप्रोमाइज्ड' नेता तक कह दिया। आरोप इतने निजी और तीखे थे कि बैठक सुलह का मंच बनने के बजाय अखाड़ा बन गई। अब सवाल यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत, बल्कि यह है कि 2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस इस स्थिति तक पहुंची कैसे।

यदि इसकी जड़ों में जाएं तो यह कलह नई नहीं है। इसकी शुरुआत 2021 में ही दिखाई देने लगी थी, जब कांग्रेस आलाकमान ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया। इसके पीछे दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति थी। पंजाब में लगभग 32 प्रतिशत दलित आबादी है और कांग्रेस को उम्मीद थी कि चन्नी के नेतृत्व से उसे राजनीतिक लाभ मिलेगा। लेकिन चुनाव परिणामों ने साबित कर दिया कि केवल जातीय समीकरण जीत की गारंटी नहीं होते। संगठन की कमजोरी और आम आदमी पार्टी की लहर के सामने यह रणनीति विफल रही।

हार के बाद पार्टी ने एक और प्रयोग किया। अमरिंदर के जाने के बाद राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। वे युवा और आक्रामक नेता हैं तथा शहरी और हिंदू मतदाताओं को साधने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन पार्टी के पुराने नेताओं को लगा कि उन्हें हाशिए पर धकेला जा रहा है। यहीं से असंतोष ने आकार लेना शुरू किया। पिछले कई महीनों से नाराज गुटों की बंद कमरों में बैठकें चल रही थीं और भूपेश बघेल की बैठक उन्हें खुलकर सामने आने का अवसर दे गई।

चन्नी का तर्क है कि वड़िंग के नेतृत्व में दलित वोट बैंक खिसक रहा है और उन्हें फिर से केंद्रीय भूमिका मिलनी चाहिए। दूसरी ओर रंधावा स्वयं को जाट सिख नेतृत्व के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। उनका आरोप है कि मौजूदा प्रदेश नेतृत्व सरकार के सामने नरम रवैया अपनाए हुए है। वहीं वड़िंग ने भी पलटवार करते हुए रंधावा की केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात का उल्लेख कर उन्हें भाजपा का 'स्लीपर सेल' तक बता दिया। आरोपों का स्तर इतना नीचे पहुंच चुका है कि संगठनात्मक अनुशासन की बात भी बेमानी लगने लगी है।

इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लड़ाई मुद्दों पर नहीं, बल्कि नेतृत्व और वर्चस्व पर केंद्रित है। नशा, बेरोजगारी, किसान संकट, उद्योग और सीमा सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे पीछे छूट गए हैं। जब नेता सार्वजनिक मंचों से एक-दूसरे पर हमला करते हैं तो कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूटता है। पिछले पांच वर्षों में कांग्रेस ने पंजाब में कई बार नेतृत्व बदला, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।

अब आलाकमान के सामने तीन विकल्प हैं। पहला, अनुशासनहीनता पर कड़ी कार्रवाई कर स्पष्ट संदेश देना। दूसरा, सभी प्रमुख नेताओं को साथ लेकर सामूहिक नेतृत्व का फार्मूला अपनाना। तीसरा, किसी नए और तटस्थ चेहरे को आगे लाना। हालांकि पंजाब जैसे राज्य में ऐसा सर्वमान्य चेहरा तलाशना आसान नहीं होगा।

इस अंतर्कलह का सबसे बड़ा नुकसान पंजाब की जनता को हो रहा है। राज्य किसान संकट, नशे, बेरोजगारी, पलायन, उद्योगों की सुस्ती और सीमा सुरक्षा जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में विपक्ष की भूमिका मजबूत होनी चाहिए थी, लेकिन कांग्रेस अपने ही अंतर्विरोधों में उलझी हुई है। 2017 में कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में पार्टी एकजुट थी और सत्ता में आई। 2022 में वही एकजुटता टूटी तो पार्टी 18 सीटों तक सिमट गई। यदि यही स्थिति बनी रही तो 2027 में उसके सामने अस्तित्व का संकट भी खड़ा हो सकता है।

कांग्रेस को समझना होगा कि पंजाब में केवल जातीय और क्षेत्रीय समीकरण पर्याप्त नहीं हैं। सबसे अधिक जरूरत विश्वसनीय नेतृत्व और मजबूत संगठन की है। कार्यकर्ता तभी पूरी ताकत से मैदान में उतरता है, जब उसे विश्वास हो कि उसके नेता पार्टी के लिए लड़ रहे हैं, न कि केवल अपनी राजनीतिक स्थिति बचाने के लिए। अब समय आधे-अधूरे फैसलों का नहीं, बल्कि स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति का है। यदि कांग्रेस अपने भीतर की लड़ाई नहीं रोक सकी तो 'लड़ता पंजाब' का नारा केवल पोस्टरों तक सीमित रह जाएगा और जनता एक बार फिर उसे विपक्ष की भूमिका के योग्य भी नहीं मानेगी।

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