संपादकीय
16 Jul, 2026

वीरान हो रहे उत्तराखंड के गांव: देवभूमि से देवता भी कर रहे पलायन

उत्तराखंड में लगातार बढ़ते पलायन के कारण हजारों गांव खाली हो रहे हैं, जिससे राज्य की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान पर गंभीर संकट गहराता जा रहा है।

देहरादून, 16 जुलाई।

उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां हर पहाड़ पर मंदिर, हर नदी में आस्था और हर गांव में एक कहानी बसती है। पर आज उसी देवभूमि की कहानी सबसे दर्दनाक मोड़ पर खड़ी है। 2011 की जनगणना के बाद से अब तक राज्य के 1,048 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं और 2,500 से अधिक गांव ऐसे हैं, जो खाली होने की कगार पर हैं। पलायन आयोग की रिपोर्ट चीख-चीखकर कह रही है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के नक्शे से कई गांव मिट जाएंगे। आंकड़े डराने वाले हैं। राज्य में गांवों से पलायन की गति हर साल लगभग 15 प्रतिशत बढ़ रही है। इसका मतलब है कि हर साल हजारों परिवार अपना घर, गांव, खेत और अपनी जड़ें छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं। सबसे अधिक असर पहाड़ी जिलों अल्मोड़ा, पौड़ी, टिहरी, चमोली और बागेश्वर पर पड़ा है। अल्मोड़ा जिले में अकेले 250 गांव ऐसे हैं, जहां आबादी 50 से भी कम रह गई है और 15 गांव पूरी तरह वीरान हो चुके हैं।

पलायन का कारण कोई एक नहीं है। यहां कारणों का ऐसा जाल है, जिसने पूरे पहाड़ को जकड़ लिया है। रोजगार की कमी सबसे बड़ी समस्या है। गांव में युवाओं के पास खेती के अलावा कोई विकल्प नहीं है और वह खेती भी अब घाटे का सौदा बन गई है। जंगली जानवर फसलें नष्ट कर देते हैं, पानी की कमी है और बाजार तक पहुंच आसान नहीं है। इसलिए 26 से 35 वर्ष के युवा सबसे पहले गांव छोड़ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पलायन करने वालों में सबसे बड़ा वर्ग कामकाजी उम्र का है। यानी गांवों से सबसे पहले वही लोग जा रहे हैं, जिन पर भविष्य की जिम्मेदारी थी। परिणाम यह है कि गांवों में अब न युवाओं की चहल-पहल बची है और न बच्चों की किलकारियां।

शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव भी पलायन की बड़ी वजह है। पहाड़ के दूर-दराज के गांवों में आज भी माध्यमिक विद्यालय नहीं हैं। कई स्थानों पर बच्चों, विशेषकर बेटियों, को 12वीं तक पढ़ने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। अस्पताल दूर हैं, सड़कें अधूरी हैं और प्रसव जैसी आपात स्थिति में महिलाओं को डोली के सहारे अस्पताल पहुंचाना पड़ता है। ऐसे में कोई भी माता-पिता अपने बच्चों का भविष्य वहां नहीं देखता। पहले बच्चे पढ़ाई के लिए शहर जाते हैं, फिर धीरे-धीरे पूरा परिवार वहीं बस जाता है।

सामाजिक स्थिति भी चिंताजनक हो गई है। अनेक गांवों में विवाह योग्य युवकों के लिए रिश्ते नहीं मिल रहे हैं। लगभग 120 गांव ऐसे चिन्हित किए गए हैं, जहां युवकों की शादी नहीं हो पा रही, क्योंकि लड़की वाले पहाड़ में रिश्ता करने से इनकार कर देते हैं। उनका तर्क है कि जहां बिजली, पानी, सड़क और मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, वहां बेटी का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा। नतीजा यह है कि गांवों में कई घरों पर ताले लटक गए हैं और बचे हुए बुजुर्ग अकेले अपनी जमीन, घर और देवस्थलों की रखवाली कर रहे हैं।

पलायन आयोग ने वर्ष 2017 में चेतावनी दी थी कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो 2025 तक 2,462 गांव निर्जन हो जाएंगे। आज स्थिति उसी दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है। इसका अर्थ है कि हर वर्ष लगभग 200 गांव वीरान होने की ओर बढ़ रहे हैं। सरकारों ने सड़क, बिजली और पानी पर कुछ काम अवश्य किया, लेकिन स्थायी रोजगार सृजन पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। मनरेगा ने सीमित अवधि का रोजगार दिया, होमस्टे और पर्यटन की योजनाएं बनीं, लेकिन उनका प्रभाव व्यापक नहीं हो सका। कृषि के लिए सब्सिडी दी गई, पर जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा का कोई प्रभावी समाधान नहीं निकला। निराश होकर किसानों ने खेती छोड़नी शुरू कर दी।

इस पलायन का सबसे बड़ा नुकसान उत्तराखंड की संस्कृति और पर्यावरण को हो रहा है। सदियों पुराने गांव खाली हो रहे हैं, मंदिरों में पुजारी नहीं बचे, खेत बंजर हो रहे हैं और जंगल आबादी तक पहुंच रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष भी बढ़ रहा है। दूसरी ओर देहरादून, हल्द्वानी और ऋषिकेश जैसे शहरों पर आबादी का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

पलायन आयोग ने गांवों को आर्थिक इकाई बनाने, 'एक गांव-एक उत्पाद' जैसी नीति लागू करने, टेलीमेडिसिन और दूरस्थ शिक्षा को बढ़ावा देने, होमस्टे और साहसिक पर्यटन विकसित करने तथा हर गांव तक सड़क और इंटरनेट पहुंचाने जैसे सुझाव दिए हैं। कुछ क्षेत्रों में जैविक खेती, हर्बल उत्पाद और ग्रामीण पर्यटन के सकारात्मक परिणाम भी मिले हैं, लेकिन इन्हें पूरे राज्य में मिशन मोड में लागू करने की आवश्यकता है। राजनीतिक इच्छाशक्ति भी उतनी ही जरूरी है। जनप्रतिनिधियों को गांवों की वास्तविक स्थिति समझनी होगी और समाज को भी अपने गांवों से जुड़ाव बनाए रखना होगा।

उत्तराखंड का पलायन केवल जनसंख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि उसकी पहचान का संकट है। यदि गांव खाली हो गए तो देवभूमि की आत्मा भी सूनी हो जाएगी। लोकगीत, लोकनृत्य और परंपराएं इतिहास के पन्नों तक सिमट जाएंगी। इसलिए सरकार, समाज और युवाओं को मिलकर यह संकल्प लेना होगा कि गांव बचेंगे, तभी उत्तराखंड बचेगा और तभी देवभूमि का वास्तविक अर्थ भी सुरक्षित रह सकेगा।

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