जोधपुर, 16 जुलाई।
राजस्थान हाईकोर्ट ने नर्सिंग ऑफिसर भर्ती-2023 से जुड़े एक मामले में सैकड़ों अभ्यर्थियों को बड़ी राहत दी है। न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि सरकारी अस्पतालों या स्वीकृत पदों पर काम करने वाले नर्सिंग कर्मियों को केवल इस आधार पर बाहर नहीं किया जा सकता कि उन्हें वेतन ट्रस्ट, एनजीओ या पीपीपी मॉडल के जरिए मिला। अदालत ने माना है कि कार्य की वास्तविक प्रकृति महत्वपूर्ण है, न कि वेतन मिलने का माध्यम।
याचिकाकर्ताओं के वकील हिमांशु पारीक ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किलों ने वर्ष 2019 से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में कठिन परिस्थितियों और कोविड काल के दौरान सेवाएं दी हैं। सरकार द्वारा वेतन भुगतान का जरिया ट्रस्ट या अन्य संस्थाओं को बनाए जाने के कारण इनके अनुभव प्रमाण-पत्रों को दरकिनार करना नियमों के विरुद्ध है। पूर्ववर्ती गोविंद दायमा प्रकरण का हवाला देते हुए पक्ष रखा गया कि अनुभव का मूल्यांकन सेवा की गुणवत्ता से होना चाहिए।
न्यायमूर्ति डॉ. नुपुर भाटी की पीठ ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि वेतन वितरण की प्रशासनिक प्रक्रिया किसी के वर्षों के वास्तविक कार्य अनुभव को शून्य नहीं कर सकती। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की उम्मीदवारी रद्द करने वाले आदेश को दरकिनार कर दिया है।
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ताओं को उनके कार्य अनुभव के आधार पर तत्काल बोनस अंक दिए जाएं। इसके बाद यदि वे मेरिट सूची में स्थान बनाते हैं, तो आठ सप्ताह के भीतर उन्हें नर्सिंग ऑफिसर के पद पर नियुक्ति प्रदान की जाए। इस फैसले से राज्य के उन सभी अभ्यर्थियों में खुशी की लहर है जो लंबे समय से इस भर्ती प्रक्रिया में अपने अनुभव को लेकर अनिश्चितता में थे।













