मीरजापुर, 16 जुलाई।
के.बी.पी.जी. कॉलेज में आयोजित सात दिवसीय 'बोधि-पथ' कार्यशाला का तीसरा दिन पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के विमर्श के नाम रहा। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान लखनऊ और कॉलेज के संयुक्त प्रयास से चल रहे इस कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि बौद्ध दर्शन प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने का सबसे प्रभावी सूत्र प्रदान करता है। आज के दौर में जब दुनिया जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब बुद्ध के विचार और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं।
कार्यशाला के पहले सत्र में काशी हिंदू विश्वविद्यालय की डॉ. सीसा मिश्रा ने बौद्ध दृष्टिकोण के माध्यम से नदियों, झीलों और वन्यजीवों को बचाने का आह्वान किया। उन्होंने अपने व्याख्यान में स्पष्ट किया कि मानव का अस्तित्व प्रकृति के साथ संतुलन पर ही टिका है। यदि हम अपने आस-पास की वनस्पतियों और पर्यावरण का सम्मान नहीं करेंगे, तो विकास का लक्ष्य कभी पूरा नहीं हो पाएगा।
दूसरे सत्र में डॉ. श्री प्रकाश तिवारी ने बौद्ध धर्म में निहित पर्यावरण चेतना को विस्तार से परिभाषित किया। उन्होंने बताया कि भगवान बुद्ध के उपदेशों में हर जीव के प्रति दया और संरक्षण की जो सीख दी गई है, वह पर्यावरणीय संकट का सबसे सटीक समाधान है। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. अर्चना पाण्डेय ने की और संचालन डॉ. कुलदीप पाण्डेय द्वारा किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में प्राध्यापक और विद्यार्थी उपस्थित रहकर बौद्ध शिक्षाओं से लाभान्वित हुए।











