संपादकीय
16 Jul, 2026

फिट पुलिस, फिट तंत्र

पुलिसकर्मियों की शारीरिक और मानसिक फिटनेस को प्राथमिकता देकर कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक दक्षता और जनता के विश्वास को अधिक मजबूत बनाया जा सकता है।

नई दिल्ली, 16 जुलाई।

यदि वर्दी तंदुरुस्त होगी तो कानून-व्यवस्था भी मजबूत होगी। पुलिस को समाज का दर्पण कहा जाता है। जिस राज्य की पुलिस जितनी चुस्त और तंदुरुस्त होगी, उस राज्य का कानून-व्यवस्था तंत्र भी उतना ही मजबूत होगा। पर पिछले कई वर्षों से यह देखने में आ रहा है कि पुलिस की ड्यूटी की प्रकृति और बढ़ते कार्यभार के कारण उनके अपने स्वास्थ्य पर सबसे अधिक असर पड़ रहा है। लगातार लंबी ड्यूटी, घंटों खड़े होकर यातायात संभालना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना, त्योहारों और वीआईपी ड्यूटी में रातभर जागना—इन सबके कारण पुलिसकर्मियों की दिनचर्या पूरी तरह बिगड़ गई है। न खाने का समय तय है, न सोने का और न ही परिवार के साथ बैठने का अवसर मिल पाता है।

ऐसी परिस्थितियों में शरीर धीरे-धीरे जवाब देने लगता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा और मानसिक तनाव पुलिस विभाग में आम समस्याएं बन चुकी हैं। थाने में बैठा अधिकारी फाइलों के बोझ से दबा है, तो मैदान में तैनात जवान धूप, बारिश और भीड़ के दबाव से जूझ रहा है। दोनों ही समान रूप से शारीरिक और मानसिक थकान का सामना कर रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर मानव शरीर कब तक इस तरह लगातार काम कर सकता है? मशीन भी बिना रुके चलती रहे तो गर्म हो जाती है, फिर इंसान तो आखिर इंसान ही है।

ऐसे में यदि पुलिस विभाग ने फिटनेस पर ध्यान देने की पहल शुरू की है तो यह बेहद सराहनीय कदम है। यह केवल पुलिसकर्मियों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र के लिए संजीवनी साबित हो सकता है। फिटनेस का अर्थ केवल परेड और दौड़ नहीं है। इसका मतलब नियमित स्वास्थ्य जांच, संतुलित भोजन, मानसिक स्वास्थ्य परामर्श और काम के बीच पर्याप्त विश्राम भी है।

यातायात पुलिस घंटों धूप, धूल और शोर के बीच ड्यूटी करती है। कानून-व्यवस्था में तैनात जवान भीड़ को नियंत्रित करता है और रात में गश्त करता है। यदि उसे समय पर भोजन और पर्याप्त आराम नहीं मिलेगा तो उसकी सतर्कता कैसे बनी रहेगी? थका हुआ दिमाग गलत निर्णय ले सकता है और एक गलत निर्णय किसी की जान पर भी भारी पड़ सकता है। इसलिए फिटनेस को अब सुविधा नहीं, बल्कि आवश्यकता के रूप में देखा जाना चाहिए।

फिट पुलिस से पूरे तंत्र में कसावट आएगी। जब जवान शारीरिक रूप से मजबूत होगा तो वह अपराधियों से बेहतर तरीके से निपट सकेगा। जब अधिकारी मानसिक रूप से स्वस्थ होगा तो वह जनता की समस्याओं को अधिक संवेदनशीलता से सुनेगा। जब थाने का वातावरण सकारात्मक होगा तो वहां आने वाला फरियादी भी विश्वास के साथ अपनी बात रख सकेगा। आज अक्सर शिकायत सुनने को मिलती है कि पुलिस चिड़चिड़ी हो गई है या लोगों की बात ठीक से नहीं सुनती। लेकिन इसके पीछे लगातार काम का दबाव और अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा भी एक बड़ा कारण है।

अब समय आ गया है कि हर जिले और हर थाने में फिटनेस को प्राथमिकता दी जाए। सप्ताह में एक दिन सामूहिक योग और व्यायाम कराया जाए। थानों में बेसिक जिम की सुविधा उपलब्ध हो। लंबी ड्यूटी के बाद विश्राम कक्ष बनाए जाएं। भोजन के समय की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए और वर्ष में कम से कम दो बार सभी पुलिसकर्मियों की स्वास्थ्य जांच अनिवार्य की जाए।

इसके साथ ही वरिष्ठ अधिकारियों को भी उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। जब बड़े अधिकारी स्वयं फिट रहेंगे, सुबह परेड में शामिल होंगे और जवानों के साथ मैदान में दौड़ लगाएंगे, तब नीचे तक यह संदेश जाएगा कि फिटनेस कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि ड्यूटी का अभिन्न हिस्सा है।

समाज को भी यह समझना होगा कि पुलिसकर्मी भी इंसान हैं। उनसे चौबीसों घंटे मशीन की तरह काम लेने की अपेक्षा उचित नहीं है। त्योहारों पर जब हम अपने परिवार के साथ उत्सव मना रहे होते हैं, तब वही पुलिसकर्मी सड़क पर हमारी सुरक्षा में तैनात रहता है। इसलिए व्यवस्था से यह अपेक्षा भी होनी चाहिए कि पुलिस की ड्यूटी में मानवीय पक्ष का पूरा ध्यान रखा जाए।

यह पहल केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। रोज अपराध, दुर्घटनाएं, लाशें, पारिवारिक विवाद और तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने का असर पुलिसकर्मियों के मन पर भी पड़ता है। इसलिए नियमित काउंसलिंग और तनाव प्रबंधन के कार्यक्रम भी आवश्यक हैं, ताकि वर्दी के भीतर का इंसान भी स्वस्थ रह सके।

यदि यह अभियान गंभीरता से लागू हुआ तो इसका सीधा लाभ आम जनता को मिलेगा। अपराध नियंत्रण बेहतर होगा, पुलिस का रिस्पांस टाइम घटेगा और पुलिस तथा जनता के बीच विश्वास मजबूत होगा। एक फिट पुलिसकर्मी अधिक ऊर्जा, संवेदनशीलता और दक्षता के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभा सकेगा।

देश की सुरक्षा सेना करती है और समाज की सुरक्षा पुलिस। यदि सेना को फिट रखना आवश्यक है तो पुलिस को फिट रखना भी उतना ही जरूरी है। यह पहल देर से सही, लेकिन सही दिशा में उठाया गया कदम है। अब इसे केवल फाइलों तक सीमित न रखकर जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए, ताकि हर थाने और हर चौकी से यह संदेश जाए—हम फिट हैं, इसलिए आपकी सुरक्षा के लिए हमेशा तैयार हैं। वर्दी तंदुरुस्त होगी तभी तंत्र में कसावट आएगी और जब तंत्र मजबूत होगा, तभी आम आदमी चैन की नींद सो सकेगा।

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