संपादकीय
16 Jul, 2026

लंबी उम्र नहीं, स्वस्थ जीवन की जरूरत

महिलाओं की औसत आयु बढ़ने के बावजूद उनके स्वस्थ जीवनकाल को बेहतर बनाने के लिए पोषण, समय पर उपचार, जागरूकता और प्रभावी स्वास्थ्य सेवाओं पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।

नई दिल्ली, 16 जुलाई।

भारत में महिलाओं की औसत आयु लगातार बढ़ रही है, जो स्वास्थ्य सेवाओं और जीवन स्तर में सुधार का संकेत है। लेकिन इसके साथ एक चिंताजनक सच्चाई भी सामने आ रही है। महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक वर्ष जीवित रहती हैं, परंतु उनके जीवन का बड़ा हिस्सा बीमारियों, कमजोरी और उपचार के बीच गुजरता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार भारत में महिलाओं की औसत आयु लगभग 69 वर्ष है, जबकि पुरुषों की 65.5 वर्ष है। इसके बावजूद महिलाओं का स्वस्थ जीवनकाल अपेक्षाकृत कम है। यानी लंबी उम्र मिल रही है, लेकिन स्वस्थ जीवन नहीं।

इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं। देश में 15 से 49 वर्ष की लगभग 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। बचपन से पर्याप्त पोषण न मिलना, किशोरावस्था में आयरन और कैल्शियम की कमी तथा गर्भावस्था के दौरान स्वास्थ्य की अनदेखी जीवन भर उनका साथ नहीं छोड़ती। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और जागरूकता का अभाव समस्या को और गंभीर बना देता है, जबकि शहरों में अनियमित जीवनशैली, तनाव, व्यायाम की कमी और असंतुलित खानपान नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।

भारतीय महिलाओं पर घर और कार्यस्थल की दोहरी जिम्मेदारी भी स्वास्थ्य पर भारी पड़ती है। परिवार की देखभाल में वे अपने स्वास्थ्य को सबसे अंत में रखती हैं। थकान, कमजोरी या दर्द को सामान्य मानकर टाल देती हैं और जब तक जांच कराती हैं, तब तक बीमारी गंभीर रूप ले चुकी होती है। यही कारण है कि अब मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कैंसर और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी गैर-संचारी बीमारियां पहले की तुलना में कम उम्र में ही दिखाई देने लगी हैं। मानसिक स्वास्थ्य भी एक बड़ी चुनौती है। अवसाद और चिंता की समस्या महिलाओं में अधिक पाई जाती है, लेकिन इलाज कराने वाली महिलाओं की संख्या आज भी बहुत कम है।

इस स्थिति को बदलने के लिए केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। पोषण अभियान, आयुष्मान भारत और मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों का प्रभाव तभी बढ़ेगा, जब उनका क्रियान्वयन गांव-गांव तक प्रभावी ढंग से पहुंचे। स्कूल स्तर से ही लड़कियों के पोषण, नियमित स्वास्थ्य जांच और आयरन-फोलिक एसिड की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। परिवारों को भी बेटा-बेटी के बीच भोजन, शिक्षा और उपचार में भेदभाव समाप्त करना होगा।

महिलाओं को भी यह समझना होगा कि परिवार की देखभाल के साथ स्वयं का स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नियमित व्यायाम, संतुलित भोजन, पर्याप्त नींद और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच अनेक बीमारियों से बचा सकती है। कार्यस्थलों पर भी महिला कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य जांच और मानसिक परामर्श जैसी सुविधाएं बढ़ाई जानी चाहिए।

भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। यह लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब देश की आधी आबादी शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होगी। महिलाओं की बढ़ती आयु निश्चित रूप से सुखद संकेत है, लेकिन अब आवश्यकता इस बात की है कि यह अतिरिक्त जीवन बीमारी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सम्मान और सक्रियता के साथ बीते। स्वस्थ महिला ही स्वस्थ परिवार और स्वस्थ भारत की सबसे मजबूत आधारशिला है।

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