नई दिल्ली, 16 जुलाई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी वसीयत को लेकर संदिग्ध परिस्थितियां हैं, तो उसे केवल गवाह की गवाही के आधार पर वैध नहीं माना जा सकता। वसीयत को सही साबित करने की पूरी जिम्मेदारी उसे पेश करने वाले पक्ष पर होती है। उसे अदालत को यह संतुष्ट करना होगा कि वसीयत, वसीयतकर्ता की स्वतंत्र और समझ-बूझकर व्यक्त की गई अंतिम इच्छा थी। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने इसी आधार पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए वर्ष 1974 की एक पंजीकृत वसीयत को अमान्य करार दिया। कोर्ट ने पाया कि वसीयतकर्ता छज्जू राम एक अशिक्षित किसान थे, जो केवल अंगूठा लगाना जानते थे और वसीयत से जुड़ी कई बातों का प्रतिवादी संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।
यह विवाद छज्जू राम की संपत्ति को लेकर था। उनकी पत्नी भाम्बो देवी का कहना था कि पति की मृत्यु बिना वसीयत के हुई, इसलिए वह उनकी एकमात्र कानूनी वारिस हैं। वहीं दूसरी ओर प्रतिवादियों ने वर्ष 1974 की पंजीकृत वसीयत प्रस्तुत कर पूरी संपत्ति पर दावा किया। सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि इस वसीयत में पत्नी को पूरी तरह संपत्ति से वंचित कर दिया गया था और पूरी जायदाद ऐसे लोगों के नाम कर दी गई थी, जो करीबी रिश्तेदार भी नहीं थे। वसीयत में उन्हें भतीजा बताया गया था, लेकिन इसका कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके अलावा, दस्तावेज में बिना प्रमाणीकरण के काट-छांट भी की गई थी।
पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में वसीयत साबित करना केवल हस्ताक्षर या गवाह की गवाही तक सीमित नहीं रह जाता। संदेह की स्थिति में वसीयत पेश करने वाले को हर संदेह का संतोषजनक उत्तर देना होगा। इन्हीं कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत का फैसला बहाल करते हुए भाम्बो देवी को संपत्ति का वैध स्वामी घोषित किया।










