भोपाल, 29 जुलाई।
मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई अब नए चरण में पहुंच गई है। राज्य की दो प्रमुख जांच एजेंसियों, लोकायुक्त और आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू), के पास पिछले पांच वर्षों में 50 हजार से ज्यादा शिकायतें पहुंची हैं। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि आम जनता अब भ्रष्टाचार को लेकर जागरूक हुई है और वह चुप नहीं बैठना चाहती। लेकिन इसके साथ ही यह आंकड़ा यह भी बताता है कि शासन और प्रशासन के स्तर पर अभी भी बहुत काम करने की जरूरत है।
विधानसभा में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2020 से 2025 के बीच लोकायुक्त को 27,192 शिकायतें मिलीं। इनमें से 2,475 मामलों में जांच दर्ज की गई। इसके बाद विशेष पुलिस स्थापना ने 1,451 एफआईआर दर्ज कीं और 477 मामलों में अदालत में चालान पेश किया। इसी तरह ईओडब्ल्यू के पास जून 2020 से जून 2026 के बीच 23,261 आवेदन पहुंचे। इनमें से केवल 3,018 मामलों को विस्तृत जांच योग्य मानते हुए शिकायत के रूप में दर्ज किया गया, जबकि बड़ी संख्या में आवेदन प्रारंभिक जांच के बाद बंद कर दिए गए। कई मामले अभी भी लंबित हैं।
ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं, क्योंकि हर साल हजारों शिकायतें आ रही हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर परिणाम बहुत कम निकल रहे हैं। लोकायुक्त के पास आई 27,192 शिकायतों में से केवल लगभग नौ प्रतिशत मामलों में ही एफआईआर दर्ज हुई और लगभग दो प्रतिशत मामलों में ही अदालत तक बात पहुंची। ईओडब्ल्यू की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। 23,261 आवेदनों में से केवल लगभग 13 प्रतिशत मामलों में ही जांच शुरू हुई। बाकी मामले या तो खारिज कर दिए गए या फिर फाइलों में धूल खा रहे हैं।
शिकायतों की बढ़ती संख्या का एक बड़ा कारण लोगों में जागरूकता का बढ़ना है। पहले लोग रिश्वत देना और लेना सामान्य बात मानते थे, लेकिन अब सूचना का अधिकार (आरटीआई), सोशल मीडिया और जागरूकता अभियानों के कारण लोग सवाल पूछने लगे हैं। पटवारी से लेकर पुलिस अधिकारी तक और क्लर्क से लेकर बड़े अफसर तक, हर स्तर की शिकायतें सामने आ रही हैं। जमीन के फर्जीवाड़े, सरकारी योजनाओं में गड़बड़ी, नौकरी में घूस और ठेकेदारी में भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा शिकायतों के कारण बने हैं।
शिकायत आने के बाद जांच की प्रक्रिया बहुत धीमी है। लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू, दोनों के पास स्टाफ और तकनीकी संसाधनों की कमी है। कई बार राजनीतिक दबाव के कारण फाइलें अटक जाती हैं। कई शिकायतकर्ता महीनों, बल्कि वर्षों तक चक्कर काटते रहते हैं, लेकिन उन्हें न तो जांच की प्रगति का पता चलता है और न ही परिणाम का। इस कारण लोगों का भरोसा धीरे-धीरे टूट रहा है।
यह भी सही है कि हर शिकायत की जांच करना संभव नहीं होता। कई शिकायतें फर्जी होती हैं, कई व्यक्तिगत रंजिश के कारण की जाती हैं और कई मामलों में पर्याप्त साक्ष्य नहीं होते। इसलिए पहले स्तर पर ही उन्हें छांट दिया जाता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यदि 50 हजार से ज्यादा शिकायतें आई हैं, तो इसका मतलब है कि इतने लोगों को लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। कम से कम हर शिकायत की प्राथमिक जांच तो होनी ही चाहिए।
एक और बड़ी समस्या साक्ष्य जुटाने की है। भ्रष्टाचार के मामलों में साक्ष्य मिटा दिए जाते हैं, गवाह डर जाते हैं और फाइलें गायब हो जाती हैं। कई बार आरोपी अधिकारी इतने प्रभावशाली होते हैं कि जांच अधिकारियों पर ही दबाव डाल देते हैं। ऐसे में ईमानदार अधिकारी भी पीछे हट जाते हैं और मामला कमजोर हो जाता है। इसी कारण 477 चालान पेश होने के बाद भी कितने मामलों में सजा हुई, इसका स्पष्ट आंकड़ा सामने नहीं है।
जनता की उम्मीद अब सरकार से है कि वह इन दोनों एजेंसियों को और मजबूत करे। सबसे पहले स्टाफ की संख्या बढ़ाई जाए, जांच के लिए आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराई जाए और हर तीन महीने में प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, ताकि लोगों को पता चले कि उनकी शिकायत का क्या हुआ। समय-सीमा तय की जाए कि एक शिकायत का अधिकतम छह महीने में निपटारा हो। व्हिसल ब्लोअर यानी शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखी जाए और उसे सुरक्षा प्रदान की जाए, ताकि लोग डर के कारण पीछे न हटें।
इस बीच सकारात्मक बात यह भी है कि सरकार ने भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है। कई बड़े अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है, कई मंत्रियों के रिश्तेदारों तक जांच पहुंची है और ई-निविदा जैसी व्यवस्था से ठेकेदारी में पारदर्शिता लाने का प्रयास किया गया है। लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, क्योंकि जब तक निचले स्तर का क्लर्क और पटवारी नहीं सुधरेगा, तब तक आम आदमी को राहत नहीं मिलेगी।
सामाजिक संगठनों का कहना है कि केवल जांच एजेंसियों के भरोसे नहीं रहा जा सकता। समाज को भी आगे आना होगा। स्कूलों और कॉलेजों में नैतिक शिक्षा दी जाए, सरकारी कार्यालयों में हेल्प डेस्क बनाए जाएं और हर विभाग में भ्रष्टाचार विरोधी प्रकोष्ठ बनाया जाए, ताकि समस्या को जड़ से समाप्त किया जा सके।
50 हजार से ज्यादा शिकायतें आना इस बात का संकेत है कि लोकतंत्र जीवंत है और लोग अपनी आवाज उठा रहे हैं। लेकिन इन शिकायतों का समय पर निपटारा न होना इस बात का संकेत भी है कि व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं। यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त मध्यप्रदेश चाहती है, तो उसे लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू को अधिक अधिकार, पर्याप्त संसाधन और सबसे बढ़कर राजनीतिक इच्छाशक्ति देनी होगी। भ्रष्टाचार दीमक की तरह है, जो देश और राज्य दोनों को भीतर से खोखला कर देता है। 27,192 और 23,261 केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि 50 हजार से ज्यादा परिवारों की पीड़ा हैं। ये उन लोगों की उम्मीदें हैं, जो चाहते हैं कि उनका टैक्स सही जगह खर्च हो, उनके बच्चों को मेरिट के आधार पर नौकरी मिले, अस्पताल में दवा मुफ्त मिले और स्कूल में शिक्षक समय पर पहुंचें।
यदि इन शिकायतों को गंभीरता से लिया गया और समय पर कार्रवाई हुई, तो मध्यप्रदेश वास्तव में एक नया उदाहरण बन सकता है। अन्यथा ये आंकड़े हर वर्ष बढ़ते जाएंगे और लोगों का भरोसा लगातार घटता जाएगा। इसलिए अब समय आ गया है कि बातों से आगे बढ़कर काम किया जाए, क्योंकि जनता अब हिसाब मांग रही है और उसे उसका जवाब मिलना ही चाहिए।

















