भोपाल, 29 जुलाई।
सरकारें चुनाव के समय जनकल्याण का वादा करती हैं, लेकिन सत्ता में आते ही कई बार ऐसे फैसले लेती हैं जिनका सबसे बड़ा बोझ आम जनता पर पड़ता है। मध्यप्रदेश में गैस कंपनियों द्वारा ई-केवाईसी के नाम पर पांच दिन के भीतर बुकिंग रद्द करने और 1.35 लाख गैस कनेक्शन रोकने का निर्णय भी ऐसा ही सवाल खड़ा करता है। यदि सरकार की नीति वास्तव में जनहित में है, तो हर बार समझौता और परेशानी केवल जनता ही क्यों झेले?
किसी भी जनकल्याणकारी योजना का उद्देश्य अंतिम व्यक्ति तक राहत पहुंचाना होता है। लेकिन [Aadhaar Redacted] आधारित तकनीकी प्रक्रिया के नाम पर गरीब, मजदूर, बुजुर्ग और ग्रामीण महिलाओं को लंबी कतारों में खड़ा कर दिया गया है। जिनके पास न समय है, न संसाधन और न ही तकनीकी जानकारी, वही सबसे अधिक परेशान हैं। सरकार का तर्क है कि फर्जी कनेक्शन रोकने हैं और सब्सिडी का दुरुपयोग रोकना है। यह उद्देश्य उचित हो सकता है, लेकिन यदि इसकी कीमत किसी गरीब परिवार को बुझा हुआ चूल्हा देकर चुकानी पड़े तो ऐसी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह पहली बार नहीं है। पहले भी योजनाओं में अचानक नियम बदलना, छोटी समय-सीमा तय करना और पूरी जिम्मेदारी जनता पर डाल देना आम बात रही है। ई-केवाईसी जैसी प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से, पंचायत स्तर पर शिविर लगाकर और व्यापक जागरूकता अभियान चलाकर पूरी कराई जा सकती थी। लेकिन अब जल्दबाजी में लागू किए गए इस आदेश ने हजारों परिवारों को असमंजस में डाल दिया है।
इस फैसले का एक और दुष्परिणाम भ्रष्टाचार के रूप में सामने आ रहा है। कई स्थानों पर एजेंसी कर्मचारियों द्वारा जल्दी ई-केवाईसी कराने के नाम पर अतिरिक्त पैसे मांगने की शिकायतें मिल रही हैं। यानी भ्रष्टाचार रोकने के उद्देश्य से बनाई गई व्यवस्था ही भ्रष्टाचार का नया रास्ता बनती दिखाई दे रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां इंटरनेट और [Aadhaar Redacted] केंद्रों की सुविधा सीमित है, वहां पांच दिन की समय-सीमा व्यावहारिक नहीं कही जा सकती।
एक संवेदनशील सरकार की पहचान यह होती है कि वह नीति लागू करने से पहले जनता की परिस्थितियों को समझे, पर्याप्त समय दे और सुविधाएं उपलब्ध कराए। यदि ई-केवाईसी अनिवार्य है तो बुकिंग बंद करने के बजाय पहले व्यापक अभियान चलाया जाना चाहिए था। प्रक्रिया पूरी होने तक गैस आपूर्ति जारी रहती और लोगों को बिना दबाव के आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने का अवसर मिलता।
सरकार को चाहिए कि इस आदेश पर पुनर्विचार करे, समय-सीमा कम से कम 90 दिन तक बढ़ाए, प्रत्येक जिले में निःशुल्क ई-केवाईसी शिविर लगाए और प्रक्रिया पूरी होने तक किसी भी उपभोक्ता की गैस बुकिंग रद्द न करे। साथ ही गैस एजेंसियों की निगरानी और प्रभावी हेल्पलाइन की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए।
कोई भी नीति तभी जनकल्याणकारी कहलाएगी, जब वह जनता को राहत दे, भय नहीं। ई-केवाईसी का उद्देश्य आंकड़ों को दुरुस्त करना है, रसोई का चूल्हा बुझाना नहीं। सरकार को यह साबित करना होगा कि उसकी नीतियां केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी संवेदनशील और जनहितकारी हैं।
















