भोपाल नगर निगम ने एक बार फिर मेडिकल वेस्ट को लेकर सख्ती दिखाई है। खुले में मेडिकल वेस्ट फेंकने पर चार लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। नियम 2026 का हवाला देते हुए कहा गया है कि अब लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। अस्पताल, क्लीनिक और पैथोलॉजी लैब सभी इसके दायरे में आएंगे। कागज पर यह आदेश बेहद कड़ा और जनता के हित में लगता है, लेकिन सवाल वही पुराना है कि क्या यह आदेश धरातल पर उतरेगा या फिर फाइलों में दफन हो जाएगा।
भोपाल में इस तरह के सख्त आदेश पहले भी कई बार जारी हो चुके हैं। प्लास्टिक प्रतिबंध के समय भारी जुर्माने की घोषणा हुई थी। गीले और सूखे कचरे को अलग न करने पर भी जुर्माने की बात हुई थी। नो पार्किंग और अतिक्रमण पर भी बुलडोजर चलाने के दावे किए गए थे, लेकिन नतीजा हमेशा आधा-अधूरा ही रहा। शुरुआती एक-दो सप्ताह दिखावटी कार्रवाई हुई, फोटो खिंचे, बयान आए और फिर सब पुरानी पटरी पर लौट आया। कारण स्पष्ट है, नीति बनती है, लेकिन निगरानी तंत्र मजबूत नहीं बनता।
मेडिकल वेस्ट का मामला और गंभीर है, क्योंकि यहां लापरवाही का मतलब सिर्फ गंदगी नहीं, बल्कि बीमारी और संक्रमण भी है। एक सिरिंज या खून लगी पट्टी पूरे मोहल्ले को खतरे में डाल सकती है। ऐसे में निगम का यह कहना कि एएचओ निगरानी करेंगे, पर्याप्त नहीं है। भोपाल में सैकड़ों छोटे-बड़े स्वास्थ्य केंद्र हैं और एएचओ की संख्या सीमित है। उनके पास पहले से ही डेंगू, मलेरिया, सफाई और अन्य कार्यों का बोझ है। ऐसे में हर क्लीनिक तक पहुंचना और प्रतिदिन जांच करना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं दिखता।
मेडिकल वेस्ट उठाने के लिए अलग वाहन, अलग कर्मचारी और ट्रैकिंग सिस्टम चाहिए। क्या निगम के पास इसकी पूरी व्यवस्था है? यदि उठान समय पर नहीं होगा, तो छोटे क्लीनिक मजबूरी में कचरा बाहर फेंकेंगे और फिर उन पर जुर्माना लगाया जाएगा। यह दोहरा अन्याय होगा। आज तक यह सार्वजनिक नहीं हुआ कि पिछले आदेशों के तहत कितने लोगों पर कार्रवाई हुई और कितना जुर्माना वसूला गया। जब तक जवाबदेही, पारदर्शिता और प्रभावी अमल सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक चार लाख रुपये का जुर्माना भी केवल घोषणा बनकर रह जाएगा। अब देखना यह है कि यह आदेश इतिहास दोहराता है या पहली बार कागज से निकलकर सड़क पर दिखाई देता है।
















