भोपाल, 31 जुलाई।
मध्य प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकार, पद्मश्री सम्मानित और हिंदी भवन भोपाल के पूर्व निदेशक कैलाश चंद्र पंत का शुक्रवार को हृदय गति रुकने से निधन हो गया। वह 90 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे।
कैलाश चंद्र पंत ने भोपाल स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से भोपाल सहित उनके पैतृक गांव खंतोली, बागेश्वर (उत्तराखंड) में शोक का माहौल है। उनके परिवार में तीन विवाहित पुत्रियां हैं। उनका अंतिम संस्कार शनिवार को भोपाल के भदभदा विश्राम घाट पर किया जाएगा।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि कैलाश चंद्र पंत लंबे समय तक मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से जुड़े रहे। हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
कैलाश चंद्र पंत का जन्म 26 अप्रैल 1936 को इंदौर के पास महू में हुआ था। उनका पैतृक संबंध उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के खंतोली गांव से था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत इंदौर स्थित यूनियन थियोलॉजिकल सेमिनरी में व्याख्याता के रूप में की थी। बाद में वे भोपाल के पंचायत राज प्रशिक्षण केंद्र के प्राचार्य भी रहे।
वे हिंदी साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में लंबे समय तक सक्रिय रहे। उन्होंने ‘शिक्षा प्रदीप’, ‘जनधर्म’ और ‘दुर्गामी आह्वान’ जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया। इसके अलावा वे हिंदी भवन भोपाल के निदेशक रहे और भारत कृषक समाज, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति तथा मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति जैसी संस्थाओं से जुड़े रहे।
उनकी प्रमुख कृतियों में ‘कौन किसका आदमी’, ‘धुंध के आर-पार’, ‘शब्द का विचार-पथ’ और ‘शैलेश मटियानी : सृजन यात्रा’ शामिल हैं। हिंदी साहित्य में उनके योगदान के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 25 मई 2026 को उन्हें पद्मश्री सम्मान प्रदान किया था।
कैलाश चंद्र पंत को साहित्य भूषण सम्मान, निराला साहित्य सम्मान, साहित्य शिरोमणि सम्मान और संस्कृति गौरव सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा गया था। उनके निधन से हिंदी साहित्य जगत ने एक महत्वपूर्ण साहित्यकार खो दिया है।

















