दतिया, 5 अगस्त।
श्री पीताम्बरा पीठ संस्कृत महाविद्यालय और कालिदास संस्कृत अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का बुधवार को समापन हुआ। समापन समारोह में संतों और विद्वानों ने गुरु-शिष्य परंपरा, तंत्रागम तथा संस्कृत के महत्व पर अपने विचार रखे।
समारोह के मुख्य अतिथि महंत श्री रामदास जी महाराज (दंदरौआ सरकार) ने कहा कि जहां गुरु विशिष्ट होते हैं, वहां के शिष्य भी विशिष्ट बनते हैं। उन्होंने कहा कि श्री पीताम्बरा पीठ संस्कृत महाविद्यालय के विद्यार्थियों की प्रतिभा इसका प्रमाण है। उन्होंने हिंदी को अर्थ की, अंग्रेजी को रोजगार की और संस्कृत को मोक्षदायिनी भाषा बताते हुए संस्कृत अध्ययन को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
मुख्य वक्ता महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. शिवशंकर मिश्र ने तंत्रागम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समाज को तंत्र के वास्तविक स्वरूप से परिचित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में मां भवानी अपने भक्तों की रक्षा करती हैं।
कालिदास संस्कृत अकादमी के निदेशक डॉ. गोविंद गंधे ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए आयोजन में सहयोग देने वाले सभी विद्वानों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। वहीं आचार्य पं. चंद्रमोहन दीक्षित ने तंत्र के संबंध में समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करने की आवश्यकता पर बल दिया।
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की संस्कृत शोध पीठ के निदेशक प्रो. वी.वी. त्रिपाठी ने तंत्रागम के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालते हुए इसके शुद्ध स्वरूप को समझने की आवश्यकता बताई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. धीरेन्द्र सिंह चंदेल ने कहा कि यह राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी तंत्रागम अध्ययन और शोध के क्षेत्र में उपयोगी सिद्ध होगी। उन्होंने आयोजन की सफलता के लिए सभी सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और वैदिक मंगलाचरण से हुआ। स्वागत भाषण महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. हरेंद्र कुमार भार्गव ने दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुजाता शांडिल्य ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सी.एम. मिश्र ने प्रस्तुत किया। समापन समारोह में विभिन्न राज्यों से आए विद्वान, शोधार्थी, विद्यार्थी और नागरिक उपस्थित रहे।














