नई दिल्ली, 5 अगस्त।
राज्यसभा ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही देश के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। यह विधेयक पहले ही 3 अगस्त को लोकसभा से पारित हो चुका है। अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा।
विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के बढ़ते बोझ को कम करने और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के लिए यह कदम आवश्यक है। उन्होंने कहा कि संविधान पीठों के गठन के कारण कई बार नियमित मामलों की सुनवाई प्रभावित होती है। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से अधिक मामलों की सुनवाई एक साथ हो सकेगी और लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी।
मेघवाल ने कहा कि सरकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान करती है और न्यायिक सुधारों की दिशा में लगातार कार्य कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि देश को जल्द ही पहली महिला मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) मिलने की संभावना है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक और महिला न्यायाधीश की नियुक्ति भी हुई है।
विधेयक पर चर्चा के दौरान विभिन्न दलों के सांसदों ने अपने सुझाव रखे। कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा ने कहा कि केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यापक न्यायिक सुधारों की भी आवश्यकता है। तृणमूल कांग्रेस की डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने उच्च न्यायालयों में बड़ी संख्या में रिक्त पदों को शीघ्र भरने पर जोर दिया।
भाजपा सांसद मनन कुमार मिश्रा ने अधीनस्थ न्यायपालिका में रिक्तियों को भरने की आवश्यकता बताई, जबकि भाजपा सांसद संगीता यादव ने इसे लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। डीएमके, बीजद, वाईएसआरसीपी, शिवसेना, आम आदमी पार्टी और अन्य दलों के सदस्यों ने भी चर्चा में भाग लेते हुए न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करने पर बल दिया।
सरकार का मानना है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से संविधान पीठों का गठन अधिक नियमित रूप से हो सकेगा, अदालतों की कार्यक्षमता बढ़ेगी और आम नागरिकों को समयबद्ध न्याय मिलने में मदद मिलेगी।














