खड़गपुर, 22 सितंबर ।
पश्चिम बंगाल के अलावा झारखंड, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और आसपास के तमाम क्षेत्रों में मंगलवार को पारंपरिक हर्षोल्लास के साथ करम पर्व मनाया जा रहा है। आदिवासी संस्कृति से जुड़ा यह प्रमुख लोकपर्व मुख्य रूप से कृषि, प्रकृति के संरक्षण, भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और सामुदायिक एकता का प्रतीक माना जाता है। उरांव, संथाल, मुंडा, पहान, कुड़मी और भूमिज समेत लगभग 38 अलग-अलग आदिवासी समुदायों द्वारा अपनी क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार इस पर्व को उत्साह के साथ मनाया जाता है।
हर साल भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को यह उत्सव आयोजित होता है। इस पर्व की शुरुआत से तीन, पांच या सात दिन पहले महिलाएं और युवतियां सुबह सबेरे शाल की दातून लेकर नदी या तालाब पर स्नान करने जाती हैं। इसके बाद बांस से निर्मित छोटी टोकरी और डलिया में बालू भरकर गांव की सीमा पर एक निश्चित स्थान पर रखी जाती है। पारंपरिक जावा गीत गाते हुए उस स्थान की तीन बार परिक्रमा की जाती है और फिर उसमें हल्दी-तेल लगाकर मटर, मूंग, चना, ज्वार तथा कुठी जैसे विभिन्न अनाजों के बीज बोए जाते हैं।
स्नान के उपरांत अविवाहित युवतियां गीले वस्त्रों में ही शाल के पत्तों से बनी छोटी थालियों में भी इन बीजों को रोपटी हैं। इन पत्तों पर काजल और सिंदूर से तीन रेखाएं खींची जाती हैं, जिसे स्थानीय भाषा में जावा डाली कहा जाता है। डलिया और टोकरी में बीज बोने के बाद उनकी पहचान सुरक्षित रखने के लिए काश की लकड़ी गाड़ दी जाती है, जिसे जावा पाता के रूप में जाना जाता है। इन जावा को तैयार करने वाली कुंवारी कन्याओं को जावा की मां की उपाधि दी जाती है, जो इन्हें सहेज कर गांव वापस लाती हैं।
करम पूजा के दिन गांव के बुजुर्गों द्वारा तय किए गए खास स्थान पर करम की दो डालियों को लाकर स्थापित किया जाता है। ढलती शाम के बाद इन्हें करम ठाकुर और धरम ठाकुर मानकर इनकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। करम के इस पेड़ को शक्ति, उपजाऊपन, सुख-समृद्धि और बंपर फसल का प्रतीक माना जाता है। कई इलाकों में इस अनुष्ठान के दौरान मिट्टी की सुंदर आकृतियों और नए अनाज को भी पूजन सामग्री में शामिल किया जाता है।
इस पावन दिन पर कुंवारी युवतियां और महिलाएं पूरा दिन उपवास रखती हैं। शाम के समय फल, फूल और अन्य पारंपरिक नैवेद्य सजाकर करम की डाल की पूजा की जाती है। इस दौरान करम की डाल को आलिंगन करने यानी गले लगाने की एक बेहद खास परंपरा भी निभाई जाती है, जिसे प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही कई समाजों में बहनें अपने भाइयों की लंबी आयु, बेहतर सेहत और पूरे परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करती हैं।
पूजा-पाठ का दौर संपन्न होने के बाद करम की डाल और जावा डलिया को बीच में रखकर चारों तरफ मांदर, नगाड़े तथा बांसुरी की गूंज के साथ पारंपरिक करम नृत्य और लोकगीतों का दौर शुरू होता है। इन सांस्कृतिक गीतों और नृत्यों में खेती-किसानी, प्रकृति के रंगों, पारिवारिक रिश्तों और आपसी भाईचारे की गहरी झलक देखने को मिलती है। इसी सांस्कृतिक माध्यम से लोक परंपराएं और जीवन मूल्य बिना किसी रुकावट के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होते रहते हैं।
करम पर्व से जुड़ी लोक कथाओं में भाई-बहन के प्रेम के साथ-साथ करम-धरम और सात भाइयों की कहानियां विशेष स्थान रखती हैं। हालांकि भौगोलिक क्षेत्र बदलने के साथ कथाओं के विवरण और पूजन तौर-तरीकों में थोड़ा बहुत अंतर देखने को मिल सकता है। लोक मान्यता के अनुसार करम वृक्ष का अनादर करने से घर-परिवार पर विपत्तियों के बादल मंडराने लगते हैं, जबकि इसकी सच्ची श्रद्धा से पूजा करने पर घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। इन तमाम आस्थाओं के केंद्र में मूल रूप से प्रकृति का संवर्द्धन और एक खुशहाल जीवन की कामना ही निहित होती है।
अगले दिन सुबह के वक्त जावा से अंकुरित हो चुके बीजों को बाहर निकालकर आपस में बांटा जाता है और इन्हें घर के अलग-अलग पवित्र स्थानों पर रखा जाता है। इसके बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ करम की डाल को किसी नजदीकी जलाशय तक ले जाकर जल में विसर्जन कर दिया जाता है।
इस पर्व के सामाजिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए स्थानीय जानकारों का कहना है कि यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि यह हमारी कृषि संस्कृति और सामुदायिक जुड़ाव की जड़ों को मजबूत करने का एक सशक्त माध्यम है। जावा की तैयारी से लेकर करम डाल की पूजा और पारंपरिक नृत्यों तक, हर एक रस्म हमारी अनूठी संस्कृति का सजीव दस्तावेज है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि करम पर्व भाई-बहन के स्नेह, आपसी सहयोग और सामाजिक ताने-बाने को और अधिक प्रगाढ़ बनाता है। आज के दौर में नई पीढ़ी तक अपनी समृद्ध लोक परंपरा और पर्यावरण के प्रति सम्मान का भाव पहुंचाने में इस तरह के आयोजनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चली है।
















