नई दिल्ली, 29 सितंबर।
उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2024 के दौरान उत्तर प्रदेश के संभल में हुई हिंसा के कथित मास्टरमाइंड मुल्ला अफरोज पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत की गई नजरबंदी को खारिज करते हुए राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना ठोका है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अगुवाई वाली पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल कथित तौर पर अपराध कबूल कर लेने वाला बयान किसी को हिरासत में रखने का एकमात्र आधार नहीं बन सकता, बल्कि प्राधिकारियों को अन्य सुसंगत तथ्यों का भी बारीकी से परीक्षण करना होता है। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि संबंधित अधिकारी ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए तथ्यात्मक पहलुओं पर समुचित विचार किए बिना ही हिरासत का यह आदेश पारित किया था।
गौरतलब है कि नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के सर्वेक्षण आदेश के बाद भड़की उस हिंसक झड़प में चार लोगों की जान चली गई थी, जिसके करीब 54 दिन बाद अफरोज को पुलिस ने पकड़ा था। हालांकि उसे उच्च न्यायालय से जमानत मिल गई थी, लेकिन संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने 13 अक्टूबर 2025 को रासुका की धारा 3 के अंतर्गत उसे पुनः हिरासत में रखने का निर्देश दे डाला, जिसे बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी सही करार दिया था। सर्वोच्च अदालत ने उच्च न्यायालय के इसी फैसले को दरकिनार करते हुए अफरोज की याचिका स्वीकार कर ली और स्पष्ट किया कि निवारक नजरबंदी जैसे कठोर उपायों के प्रयोग में कानून की स्थापित सीमाओं का सख्ती से पालन किया जाना अनिवार्य है।













