इलाहाबाद, 30 सितंबर।
सर्वोच्च न्यायालय ने विभागीय जांच और संविधान के अनुच्छेद 311 के संरक्षण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण व्याख्या की है। न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 311(1) का प्रतिबंध तभी लागू होगा, जब सेवा से हटाने वाला अधिकारी वास्तविक नियुक्ति प्राधिकारी से निचले पद पर हो।
मामला रेलवे प्रोटेक्शन स्पेशल फोर्स के रक्षक रामधनी प्रसाद से जुड़ा था। उस पर 72 दिनों तक बिना अनुमति ड्यूटी से अनुपस्थित रहने का आरोप था। उसे आरोप पत्र दिया गया और विभागीय जांच शुरू की गई। जांच के दौरान कर्मचारी उपस्थित नहीं हुआ। जांच अधिकारी ने अनुपस्थिति का आरोप प्रमाणित मानते हुए सेवा समाप्ति की कार्रवाई की।
रामधनी प्रसाद की नियुक्ति तीन मई 1979 को कमांडेंट या मुख्य सुरक्षा अधिकारी ने की थी। इसके बाद 18 मार्च 1983 को एडजुटेंट या सहायक कमांडेंट ने उसकी सेवा समाप्ति का आदेश जारी किया। कर्मचारी ने सिविल न्यायालय में इसे चुनौती देते हुए कहा कि उससे निचले पद के अधिकारी ने सेवा समाप्ति की है और जांच में उसे उचित बचाव का अवसर भी नहीं मिला।
सिविल न्यायालय ने अनुच्छेद 311 के प्रावधानों का पालन मानते हुए कर्मचारी का मुकदमा खारिज कर दिया। इसके बाद उसने उच्च न्यायालय में अपील की। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सेवा समाप्ति को अनुच्छेद 311(1) का उल्लंघन माना और एकपक्षीय विभागीय जांच को भी त्रुटिपूर्ण बताते हुए कर्मचारी को बहाल करने का आदेश दिया।
इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय पहुंची। शीर्ष अदालत ने अभिलेखों के आधार पर कहा कि कर्मचारी की नियुक्ति और पदस्थापना वास्तव में सहायक कमांडेंट के बटालियन आदेश से हुई थी। सेवा समाप्ति का आदेश देने वाला एडजुटेंट नियुक्ति प्राधिकारी से निचले स्तर का नहीं, बल्कि समान स्तर का अधिकारी था। इसलिए अनुच्छेद 311(1) का उल्लंघन नहीं हुआ।
पीठ ने विभागीय जांच के दस्तावेजों का भी परीक्षण किया। इसमें सामने आया कि कर्मचारी को जांच में शामिल होने के लिए कई बार सूचना दी गई थी, लेकिन वह स्वयं उपस्थित नहीं हुआ और बीमारी का कारण बताता रहा। ऐसी स्थिति में उसकी अनुपस्थिति में हुई जांच को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला रद्द कर दिया और सिविल न्यायालय का निर्णय बहाल किया। इसके साथ ही रामधनी प्रसाद की सेवा समाप्ति को उचित माना गया।













