अयोध्या, 05 अक्टूबर।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को अयोध्या में उदासीन ऋषि आश्रम रानोपाली के श्री गुरु पर्व महामहोत्सव एवं संत सम्मेलन में हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि उदासीन परंपरा सनातन धर्म की ऐसी जीवंत धारा है, जिसने लंबे समय से भारत की आध्यात्मिक चेतना को मजबूत किया है।
अयोध्या पहुंचने पर राजनाथ सिंह ने हनुमानगढ़ी और श्रीराम मंदिर में दर्शन-पूजन किया। उदासीन आश्रम में संतों ने उनका माल्यार्पण कर स्वागत किया और अंगवस्त्र भेंट किया।
राजनाथ सिंह ने कहा कि भारतीय सभ्यता में ज्ञान को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उसे परंपरा और संस्कार का रूप देकर शिक्षा के माध्यम से समाज तक पहुंचाया गया। उन्होंने कहा कि शिक्षा किसी भी सभ्यता की आधारशिला होती है और संस्कृत जैसी देवभाषा में शिक्षा का महत्व और बढ़ जाता है।
उन्होंने श्री नारायण संस्कृत महाविद्यालय का उल्लेख करते हुए बताया कि इसकी स्थापना वर्ष 1912 में बाबा श्री केशवराम जी महाराज ने की थी। उन्होंने महाविद्यालय की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले संतों और आचार्यों की सराहना की तथा श्री महंत डॉ. स्वामी भरत दास जी महाराज को बधाई दी।
रक्षा मंत्री ने कहा कि संस्कृत को केवल भाषा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वेद, उपनिषद, दर्शन, व्याकरण, आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, साहित्य, न्याय और मीमांसा जैसी भारतीय ज्ञान परंपराओं को आगे बढ़ाने में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
उन्होंने कहा कि वह उत्तर प्रदेश सरकार से प्रदेश के विद्यालयों में वैदिक गणित पढ़ाने का आग्रह करेंगे। उन्होंने वैदिक गणित की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भी इसे पढ़ाया जाता है।
राजनाथ सिंह ने अयोध्या को केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि चेतना, संस्कृति और सभ्यता का केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने इस धरती को पवित्र किया और यहां से धर्म, न्याय तथा मर्यादा का संदेश दुनिया तक पहुंचा।
श्री नारायण संस्कृत महाविद्यालय के नवनिर्मित भवन को देखकर उन्होंने प्रसन्नता जताई, हालांकि आचार संहिता लागू होने के कारण उसका उद्घाटन नहीं कर सके। राम मंदिर आंदोलन में संतों के योगदान को याद करते हुए उन्होंने उनके त्याग और बलिदान का भी उल्लेख किया।














