नई दिल्ली, 06 अक्टूबर।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार की सुबह अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल 'एक्स' के माध्यम से देशवासियों के साथ एक अत्यंत प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक सुभाषित साझा किया। अपने इस संदेश में प्रधानमंत्री ने प्राचीन ग्रंथ 'समराङ्गणसूत्रधार' से उद्भूत एक विशेष श्लोक "ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥" को रेखांकित करते हुए मनुष्य के जीवन में चरित्र और सदाचार के महत्व को विस्तार से समझाया है। इस श्लोक के जरिए प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट किया है कि केवल बुद्धि, उच्च ज्ञान, उत्कृष्ट वक्ता होने की कला या कर्मों में निपुणता ही किसी व्यक्ति को महान नहीं बनाती, यदि उसके भीतर उत्तम शील और सदाचार का अभाव हो।
प्रधानमंत्री द्वारा उद्धृत किया गया यह महत्वपूर्ण श्लोक 11वीं शताब्दी के प्रसिद्ध प्राचीन ग्रंथ 'समराङ्गणसूत्रधार' से लिया गया है, जिसकी रचना मालवा के प्रतापी और विद्वान परमार वंश के राजा भोज (भोजदेव) ने की थी। वास्तुकला, नगर नियोजन, मूर्तिकला, भवनों के निर्माण और यहाँ तक कि प्राचीन यंत्रों व विमानों के सिद्धांतों का अद्भुत वर्णन करने वाले इस ऐतिहासिक ग्रंथ के इस श्लोक का अर्थ प्रधानमंत्री की पोस्ट में यह बताया गया है कि जो इंसान ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मनिष्ठा के साथ-साथ अच्छे आचरण से भी परिपूर्ण होता है, वही समाज और दुनिया में सही मायने में श्रेष्ठ और आदरणीय कहलाता है।














