प्रयागराज, 07 अक्टूबर।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि कोई भी हृष्ट-पुष्ट पति केवल बेरोजगारी या आय का नियमित साधन न होने का बहाना बनाकर अपनी पत्नी के भरण-पोषण के कानूनी दायित्व से नहीं बच सकता है। न्यायालय ने यह फैसला मुहम्मद कामिल बनाम स्टेट ऑफ यू.पी. मामले में सुनाते हुए परिवार न्यायालय के उस आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा, जिसमें पत्नी को 3,500 रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 का मुख्य उद्देश्य ऐसी महिलाओं को आर्थिक संबल प्रदान करना है, जिन्हें वैवाहिक कलह के बाद घर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया हो। यदि पति शारीरिक रूप से कार्य करने में सक्षम है, तो उसकी ऐसी दलीलें कानून की नजर में पूरी तरह निराधार और अमान्य हैं।
एक अन्य मामले में, न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ला ने राकेश कुमार बनाम स्टेट ऑफ यू.पी. की याचिका पर सुनवाई करते हुए हर साल भरण-पोषण की राशि में 10 प्रतिशत की वृद्धि करने के आदेश को पूरी तरह विधिसम्मत करार दिया। अदालत ने कहा कि बढ़ती महंगाई के इस दौर में यदि गुजारा भत्ते की राशि स्थिर रखी जाए, तो पीड़ित महिलाओं और बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी होना असंभव हो जाएगा। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि इस व्यवस्था से अदालत में बार-बार भरण-पोषण बढ़ाने के लिए नए आवेदन दायर करने की लंबी और अनावश्यक प्रक्रिया से राहत मिलेगी, जिससे लंबित मामलों के बोझ को भी कम किया जा सकेगा।













