वाराणसी, 18 अप्रैल।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा आयोजित सात दिवसीय राष्ट्रीय हैंड्स-ऑन कार्यशाला का शनिवार को समापन किया गया। यह कार्यशाला भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित प्राचीन मुद्राओं, उनके स्रोतों, लिपियों और टकसाल तकनीक पर केंद्रित रही। अंतिम दिन सैद्धांतिक और व्यावहारिक सत्रों का संयुक्त रूप से आयोजन किया गया।
समापन सत्र में विशेष रूप से उत्तर-मौर्यकालीन मुद्राओं पर विस्तृत चर्चा की गई, जिसमें नगर-निर्गत, राजशाही और जनजातीय सिक्कों के विविध पहलुओं को विस्तार से समझाया गया। प्रतिभागियों को इस काल की सिक्कों की बनावट, प्रतीकात्मकता और टकसाल तकनीक से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की गई। इन सत्रों का संचालन विशेषज्ञों द्वारा किया गया।
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को विश्वविद्यालय स्थित भारत कला भवन का अध्ययन भ्रमण भी कराया गया, जहां उन्होंने कुषाण और गुप्तकालीन सिक्कों के महत्वपूर्ण संग्रह का अवलोकन किया। इस प्रत्यक्ष अध्ययन से उन्हें सिक्कों के वर्गीकरण, उनकी शैलीगत विशेषताओं और ऐतिहासिक महत्व को समझने का अवसर मिला।
विश्व धरोहर दिवस के अवसर पर प्रतिभागियों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता भी आयोजित की गई, जिसमें विभिन्न प्रतिभागियों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों की घोषणा की गई।
विभागाध्यक्ष ने अपने संबोधन में क्षेत्र में चल रही पुरातात्विक गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए राजघाट और अगियाबीर जैसे महत्वपूर्ण स्थलों के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने विश्व धरोहर दिवस की इस वर्ष की थीम का भी उल्लेख किया। कार्यक्रम का समापन संवाद और विचार-विमर्श के साथ हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए।










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