शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण कर लिया है। जनसेवा और सामाजिक कार्यों के प्रति लंबे समय से सक्रिय रहने के कारण उन्होंने निजी जीवन में अविवाहित रहने का निर्णय लिया था। नंदीग्राम से अपनी पारंपरिक सीट पर जीत दर्ज करने के साथ-साथ भवानीपुर में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पराजित कर वे राज्य की राजनीति में एक मजबूत नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरे हैं।
15 दिसंबर 1970 को पूर्वी मेदिनीपुर के करकुली में जन्मे शुभेंदु अधिकारी ने रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है। वे कांथी के प्रतिष्ठित अधिकारी परिवार से संबंध रखते हैं, जिसका स्वतंत्रता आंदोलन में भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके पूर्वज बिपिन अधिकारी और केनाराम अधिकारी राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े थे और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभा चुके थे। बताया जाता है कि उस समय बिपिन अधिकारी को कारावास भी झेलना पड़ा था और उनके पैतृक आवास को अंग्रेजी शासन ने दो बार आग के हवाले किया था।
शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव भी काफी विस्तृत रहा है। वे दो बार लोकसभा सांसद, तीन बार विधायक और विधानसभा में पांच वर्षों तक नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं। स्थानीय स्तर पर भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई है और कांथी नगर पालिका के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया है।
राज्य सरकार में उन्होंने परिवहन और सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली है। इसके अलावा हुगली रिवर ब्रिज कमीशन और हल्दिया विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने औद्योगिक विकास में योगदान दिया। सहकारिता क्षेत्र में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही, जहां वे कांथी अर्बन कोऑपरेटिव, एग्रीकल्चर रूरल बैंक और विद्यासागर सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष रहे।
वर्ष 2000 में वे ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े थे और नंदीग्राम आंदोलन के दौरान प्रमुख चेहरा बनकर सामने आए। 2009 में तमलुक से सांसद और 2016 में नंदीग्राम से विधायक चुने गए। लंबे समय तक ममता बनर्जी के करीबी रहे शुभेंदु ने 2020 में मतभेदों के बाद भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया।
2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम सीट से ममता बनर्जी को पराजित कर राजनीतिक हलकों में बड़ा संदेश दिया। 2026 के चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम सीट बरकरार रखने के साथ-साथ भवानीपुर में भी ममता बनर्जी को शिकस्त दी। इसी दोहरी जीत, प्रशासनिक अनुभव और संगठनात्मक क्षमता को देखते हुए उन्हें राज्य की कमान सौंपी गई, जिससे वे बंगाल की राजनीति में एक नए मजबूत नेतृत्व के रूप में स्थापित हो गए हैं।










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