भोपाल, 02 नवंबर।
मध्यप्रदेश का गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था। तब महाकौशल, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल रियासत को मिलाकर हृदय प्रदेश बनाया गया था। चार अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों को एक करना आसान नहीं था। उस समय के मुख्य सचिवों ने ही चारों क्षेत्रों के कानून, राजस्व व्यवस्था और कर्मचारियों को एक सूत्र में पिरोया। भोपाल को राजधानी बनाना, सचिवालय की स्थापना और जिलों का पुनर्गठन जैसे बड़े काम नौकरशाही की सूझबूझ से ही पूरे हुए। उस दौर के मुख्य सचिवों ने ही यह तय किया कि मध्यप्रदेश केवल नक्शे पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक रूप से भी एक होगा।
कृपा शंकर शर्मा से अंटोनी डिसा तक: प्रशासनिक बदलाव की कहानी
मध्यप्रदेश में मुख्य सचिव की कुर्सी पर कई ऐसे अधिकारी बैठे, जिन्होंने प्रदेश की दिशा बदल दी। इनमें कृपा शंकर शर्मा का नाम सबसे अग्रणी है। कृपा शंकर शर्मा ने शिक्षा और प्रशासनिक सुधारों में बड़ा काम किया। उनके कार्यकाल में ई-गवर्नेंस की नींव पड़ी और मुख्यमंत्री की कई फ्लैगशिप योजनाओं को जमीन पर उतारने की व्यवस्था बनी।
अंटोनी डिसा मध्यप्रदेश के सबसे चर्चित मुख्य सचिवों में से हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में निवेश और औद्योगिक नीति को नई गति दी। उनके समय में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट की रूपरेखा तैयार हुई और प्रदेश में सिंगल विंडो सिस्टम को मजबूत किया गया। उन्होंने नर्मदा घाटी की परियोजनाओं और सड़क निर्माण में तेजी लाने के लिए विभागों के बीच समन्वय का मॉडल दिया।
इकबाल सिंह बैंस का कार्यकाल मध्यप्रदेश के प्रशासनिक इतिहास में सबसे लंबे और प्रभावशाली कार्यकालों में गिना जाता है। उन्होंने कोरोना काल में प्रदेश के पूरे प्रशासन को संभाला, स्वास्थ्य व्यवस्था को पटरी पर रखा और लॉकडाउन से लेकर अनाज वितरण तक हर मोर्चे पर नेतृत्व दिया। उनके समय में लाड़ली बहना योजना जैसी बड़ी योजना की प्रशासनिक तैयारी हुई और राजस्व विभाग में सुधार के लिए कई पोर्टल शुरू हुए।
इसके अलावा अवनि वैश्य, आर. परशुराम, एस. आर. मोहंती, अनुराग जैन और वीरा राणा जैसे मुख्य सचिवों ने भी प्रदेश को नई दिशा दी। आर. परशुराम ने जनजातीय क्षेत्रों में पेसा कानून को लागू करवाने में अहम भूमिका निभाई। एस. आर. मोहंती ने कृषि और किसान कल्याण की योजनाओं को गति दी। अनुराग जैन ने अधोसंरचना और मेट्रो रेल परियोजनाओं को आगे बढ़ाया। वीरा राणा प्रदेश की पहली महिला मुख्य सचिव बनीं और उन्होंने महिला सशक्तीकरण तथा प्रशासन में पारदर्शिता के लिए काम किया।
शैलेन्द्र सिंह से सुधीर सक्सेना तक: कानून-व्यवस्था की चुनौतियां
मुख्य सचिव के साथ-साथ पुलिस महानिदेशक यानी डीजीपी की भूमिका भी प्रदेश के निर्माण में अहम रही है। मध्यप्रदेश में कानून-व्यवस्था को संभालना बड़ी चुनौती रही है, क्योंकि यह प्रदेश नक्सल प्रभावित जिलों, चंबल के बीहड़ों और आदिवासी अंचलों से घिरा है।
एस. के. राउत, एन. के. त्रिपाठी और विजय कुमार सिंह जैसे डीजीपी ने चंबल में डकैत उन्मूलन और संगठित अपराध पर नियंत्रण में बड़ा काम किया। उनके कार्यकाल में पुलिस का आधुनिकीकरण शुरू हुआ और जिला स्तर पर पुलिस अधीक्षक कार्यालयों को मजबूत किया गया।
विवेक जौहरी और ऋषि कुमार शुक्ला के कार्यकाल में साइबर अपराध और महिला अपराध पर विशेष ध्यान दिया गया। महिला थानों की स्थापना, डायल 100 योजना और साइबर सेल को मजबूत करने का काम इसी दौर में हुआ।
सुधीर सक्सेना वर्तमान दौर के सबसे चर्चित डीजीपी रहे हैं। उन्होंने नक्सल विरोधी अभियान में निर्णायक बढ़त दिलाई। बालाघाट, मंडला और डिंडोरी में नक्सल नेटवर्क को तोड़ने में उनकी रणनीति कारगर रही। उन्होंने पुलिस में अनुशासन और जवाबदेही के लिए कई सुधार किए और पुलिसकर्मियों के कल्याण के लिए योजनाएं शुरू कीं।
इसके अलावा कैलाश मकवाना, स्वराज पुरी और अशोक दोहरे जैसे डीजीपी ने भीड़ प्रबंधन, सिंहस्थ जैसे बड़े आयोजनों में कानून-व्यवस्था और आदिवासी क्षेत्रों में सामुदायिक पुलिसिंग को बढ़ावा दिया।
विधानसभा अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष: लोकतंत्र के दो पहिए
मध्यप्रदेश विधानसभा में अध्यक्ष पद की गरिमा हमेशा ऊंची रही है। कुंजीलाल दुबे से लेकर गिरीश गौतम और नरेंद्र सिंह तोमर तक हर अध्यक्ष ने सदन को मर्यादित रखा, वहीं नेता प्रतिपक्ष के रूप में जमुना देवी, अजय सिंह और गोपाल भार्गव जैसे नेताओं ने सरकार को हमेशा आईना दिखाया। विधानसभा अध्यक्ष ने कानून बनाने में मर्यादा का ध्यान रखा, तो नेता प्रतिपक्ष ने उन कानूनों की खामियों को उजागर किया। इसी संतुलन ने मध्यप्रदेश को एक मजबूत लोकतंत्र बनाया।
71 वर्षों की योजनाओं में नौकरशाही की छाप: कागज से जमीन तक का सफर
मध्यप्रदेश की हर बड़ी योजना में मुख्य सचिव और डीजीपी की छाप दिखती है। लाड़ली लक्ष्मी योजना को जब शुरू किया गया, तब कृपा शंकर शर्मा जैसे अधिकारियों ने उसके क्रियान्वयन का रोडमैप बनाया। लाड़ली बहना योजना को इकबाल सिंह बैंस और अनुराग जैन ने डीबीटी के जरिए हर महिला तक पहुंचाया। मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना और भावांतर भुगतान योजना को राजस्व सचिवों ने लागू किया।
पुलिस के क्षेत्र में डायल 100 को 112 में बदलना, महिला सुरक्षा के लिए अभय कमांड बनाना और नशामुक्ति के लिए अभियान चलाना डीजीपी स्तर के अधिकारियों की सोच का परिणाम है। नक्सल क्षेत्रों में स्कूल खोलना और सड़क बनाना तभी संभव हुआ, जब प्रशासन और पुलिस ने मिलकर काम किया।
भविष्य की राह: नई पीढ़ी के लिए नई चुनौतियां
71 वर्ष बाद मध्यप्रदेश के सामने नई चुनौतियां हैं। साइबर ठगी, डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी, नशे का कारोबार और शहरी अपराध आज के डीजीपी के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां हैं, वहीं जलवायु परिवर्तन, बुंदेलखंड में पानी की कमी और आदिवासी क्षेत्रों में पलायन मुख्य सचिव के सामने बड़ी चुनौतियां हैं।
मध्यप्रदेश का इतिहास बताता है कि जब भी चुनौती आई है, तब मुख्य सचिव और डीजीपी ने मिलकर रास्ता निकाला है। कृपा शंकर शर्मा की सुधारवादी सोच, अंटोनी डिसा की औद्योगिक दृष्टि, इकबाल सिंह बैंस की संकट प्रबंधन क्षमता और सुधीर सक्सेना की कानून के प्रति कठोरता, यही वह पूंजी है, जो 71 वर्ष के मध्यप्रदेश को अगले 71 वर्षों तक आगे ले जाएगी।
यह प्रदेश केवल मंत्रियों से नहीं बनता। यह प्रदेश उन अधिकारियों की मेहनत से बनता है, जो फाइलों पर हस्ताक्षर करते हैं और खेतों तक योजनाएं पहुंचाते हैं।














