मुंबई, 15 मई।
वर्तमान समय में जब फिल्मों में सामाजिक और राजनीतिक विषयों को छूने से दूरी रखी जाती है, ऐसे माहौल में ‘आखिरी सवाल’ एक साहसिक और विचारों को झकझोर देने वाली फिल्म के रूप में सामने आती है। यह फिल्म केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बनती, बल्कि दर्शकों को इतिहास, विचारधारा और मीडिया की भूमिका पर गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करती है। निर्देशक अभिजीत मोहन वारंग ने इस संवेदनशील विषय को संवाद और बहस के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।
फिल्म की कहानी मुंबई के एक कॉलेज छात्र विक्की के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जिसकी आरएसएस पर आधारित पीएचडी थीसिस को प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद टकराव की स्थिति बनती है। यह विवाद धीरे-धीरे इतना बढ़ जाता है कि सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनलों तक इसकी गूंज सुनाई देने लगती है। इसके बाद विक्की प्रोफेसर के सामने इतिहास और विचारधारा से जुड़े कई कठिन प्रश्न रखता है, जिन पर पूरे देश में बहस छिड़ जाती है।
कहानी आगे बढ़ते हुए केवल छात्र और प्रोफेसर के बीच की चर्चा नहीं रह जाती, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर की वैचारिक बहस का रूप ले लेती है। फिल्म में आरएसएस, मीडिया ट्रायल, राजनीतिक सोच और समाज में मौजूद वैचारिक मतभेदों को संतुलित तरीके से दिखाया गया है। खास बात यह है कि फिल्म किसी एक पक्ष का प्रचार नहीं करती, बल्कि दोनों विचारधाराओं को अपनी बात रखने का अवसर देती है।
अभिनय की बात करें तो प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी की भूमिका में संजय दत्त अपने गंभीर और प्रभावशाली अभिनय से कहानी को मजबूती देते हैं। उनकी संवाद शैली और शांत लेकिन तीखी उपस्थिति कई दृश्यों को प्रभावशाली बना देती है। नमाशी चक्रवर्ती ने विक्की के किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया है और एक युवा छात्र के गुस्से, असमंजस और सवालों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। अमित साध एक तेजतर्रार न्यूज़ एंकर की भूमिका में कहानी की गति बनाए रखते हैं। समीरा रेड्डी अपने अलग अंदाज से नकारात्मक शेड्स में असर छोड़ती हैं, वहीं नीतू चंद्रा, त्रिधा चौधरी और मृणाल कुलकर्णी अपने-अपने किरदारों से भावनात्मक संतुलन बनाए रखती हैं।
निर्देशन के स्तर पर अभिजीत मोहन वारंग ने इस विवादित और संवेदनशील विषय को संतुलित ढंग से संभाला है। फिल्म का पहला हिस्सा काफी मजबूत और रोचक है, जिसमें वैचारिक टकराव दर्शकों को बांधे रखता है। संवाद इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरते हैं, जो कई दृश्यों को लंबे समय तक यादगार बना देते हैं। हालांकि कुछ हिस्सों में बहस की अवधि लंबी महसूस होती है, लेकिन विषय की गंभीरता के कारण यह स्वाभाविक प्रतीत होता है।
अंत में ‘आखिरी सवाल’ एक मजबूत और साहसिक डिबेट ड्रामा के रूप में सामने आती है, जो इतिहास और विचारधारा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को बेबाकी से उठाती है। फिल्म में बाबरी मस्जिद विध्वंस और महात्मा गांधी की हत्या जैसे विवादित विषयों को भी तथ्यों और बहस के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। दमदार अभिनय, प्रभावशाली संवाद और संतुलित निर्देशन के कारण यह फिल्म केवल एक राजनीतिक कहानी नहीं रहती, बल्कि एक ऐसी वैचारिक बहस बन जाती है जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद भी लंबे समय तक दर्शकों के मन में बनी रहती है।















