भारत ने शनिवार को सिंधु जल संधि (इंडस वाटर्स ट्रीटी) के तहत “अवैध रूप से गठित” बताई जा रही कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (सीओए) द्वारा जारी नए फैसले को पूरी तरह खारिज करते हुए उसे शून्य और अमान्य करार दिया है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत इस निर्णय को किसी भी रूप में मान्यता नहीं देता।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने मीडिया के सवालों के जवाब में कहा कि कथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने 15 मई को एक नया निर्णय जारी किया था, जो संधि की सामान्य व्याख्या से जुड़े मुद्दों और अधिकतम जल भंडारण क्षमता से संबंधित था।
उन्होंने दोहराया कि भारत इस कथित मध्यस्थता संस्था की वैधता को स्वीकार नहीं करता और पहले भी इसके सभी निर्णयों को खारिज कर चुका है। भारत का कहना है कि इस तरह के किसी भी निर्णय या प्रक्रिया को वैध नहीं माना जा सकता और ये पूरी तरह निरस्त हैं।
मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सिंधु जल संधि को फिलहाल स्थगित रखने का भारत का निर्णय यथावत है। भारत का तर्क है कि जब तक यह संधि स्थगन में है, तब तक वह इसके तहत किसी भी दायित्व के लिए बाध्य नहीं है।
सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित हुई थी, जिसके तहत सिंधु नदी प्रणाली के जल के उपयोग और वितरण को लेकर व्यवस्था तय की गई थी।
भारत ने यह भी दोहराया कि किसी भी कथित मध्यस्थता संस्था को ऐसे मामलों में संप्रभु देश के निर्णयों की वैधता की जांच करने का अधिकार नहीं है। साथ ही, भारत ने इससे पहले भी किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े ऐसे ही मध्यस्थता निर्णयों को अस्वीकार किया था।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस तरह की मध्यस्थता प्रक्रिया की स्थापना स्वयं संधि का गंभीर उल्लंघन है और पाकिस्तान द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों का दुरुपयोग किया जा रहा है।









