प्रेरक कहानियाँ
27 Apr, 2026

चयन का महत्व

सही और गलत के बीच किए गए चयन का परिणाम व्यक्ति के भविष्य को प्रभावित करता है, और विवेकपूर्ण निर्णय ही सफलता, सम्मान तथा आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।

धर्मात्मा राजा प्रतापभानु ईश्वर की प्राप्ति के लिए जंगल-जंगल भटकते रहे, परंतु मार्ग में भ्रमित होकर अपने वास्तविक लक्ष्य को ही भूल बैठे और ईश्वर (पूर्ण गुरु) के स्थान पर एक कपटी व्यक्ति को भगवान का स्वरूप मान लिया। वे ईश्वर के स्थान पर उस कपटी मुनि के चयन को ही अपना हित समझते रहे।

तुम्ह तजि दीन दयाला, निज हित न देखो कोउ!

और इस गलत चयन का परिणाम उन्हें क्या मिला? लक्ष्य से भटककर उन्होंने राक्षस का सहारा लिया, जिसके फलस्वरूप अगले जन्म में वे रावण के रूप में स्वयं राक्षस बन गए।

दुर्योधन ने भी यही त्रुटि की। जब श्रीकृष्ण के अनेक बार समझाने पर भी दुर्योधन नहीं माना और महाभारत का युद्ध निश्चित हो गया, तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन और दुर्योधन के समक्ष चयन रखा—एक ओर मैं अकेला, निरस्त्र खड़ा हूँ और दूसरी ओर मेरी चतुरंगिणी सेना अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित है। चयन कर लो। अर्जुन ने श्रीकृष्ण को चुना।

वहीं दुर्योधन आकार के मोह में फँस गया और उसने चतुरंगिणी सेना का चयन किया। इस चयन का परिणाम सबको ज्ञात है। इसलिए चयन करते समय केवल बाहरी आकर्षण पर न जाएँ, गुण और विवेक को भी महत्व दें।

धनुर्धारी अर्जुन के समान सामर्थ्य रखने वाला यदि कोई था तो वह अंगराज कर्ण था। कर्ण के पास अर्जुन के वध हेतु अमोघ शक्ति थी, परंतु परिस्थितियों और दबाव में आकर उसने उसका प्रयोग घटोत्कच के वध के लिए कर दिया।

जहाँ आवश्यक स्थान पर शक्ति का उपयोग होना था, वहाँ गलत चयन के कारण वह व्यर्थ चली गई। इसलिए कभी भी दबाव में आकर गलत निर्णय न लें।

विभीषण ने सही चयन कर सम्मान, प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य प्राप्त किया, जबकि कैकेयी ने गलत चयन कर तिरस्कार और दुःख पाया।

यदि चाहतीं तो विभीषण भी अनेक तर्कों के आधार पर रावण का पक्ष ले सकते थे, परंतु उन्होंने विवेकपूर्वक श्रीराम का चयन किया।

दूसरी ओर मंथरा की बातों में आकर कैकेयी ने श्रीराम के स्थान पर गलत चयन कर लिया, जिसका परिणाम उन्हें जीवनभर कलंक के रूप में मिला और पुत्र प्रेम भी उनसे दूर हो गया।

इसलिए सदैव स्मरण रखें कि चयन का आधार तर्क नहीं, विवेक होना चाहिए, तभी निर्णय पश्चाताप में नहीं बदलता।

जब व्यक्ति पूर्ण गुरु के सान्निध्य में आता है, तब उसे वह ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है जिससे उसके भीतर विवेक जागृत होता है और वह सही-गलत का निर्णय स्पष्ट रूप से कर पाता है।

अतः लक्ष्य न भूलें, विवेक का साथ न छोड़ें, बाहरी आकर्षण में न आएँ, दबाव में निर्णय न लें और सही चयन कर अपने जीवन को सुख और उन्नति की ओर ले जाएँ।

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