नंद बाबा चुपचाप रथ पर कान्हा के वस्त्र और आभूषणों की गठरी रख रहे थे। दूर ओसारे में मूर्ति की तरह शीश झुकाए खड़ी यशोदा को देखकर उन्होंने कहा—“दुखी क्यों हो, यशोदा? दूसरे की वस्तु पर अपना क्या अधिकार?”
यशोदा ने सिर उठाकर नंद बाबा की ओर देखा। उनकी आँखों में आँसू भर आए थे। नंद बाबा पास आ गए। यशोदा ने भारी स्वर में कहा—“तो क्या कान्हा पर हमारा कोई अधिकार नहीं? ग्यारह वर्षों तक हम असत्य से ही लिपटे रहे?”
नंद बाबा ने कहा—“अधिकार क्यों नहीं, कन्हैया कहीं भी रहे, वह हमारा ही लल्ला है। पर उस पर हमसे अधिक देवकी और वसुदेव का अधिकार है, और उन्हें अभी कन्हैया की आवश्यकता भी है।”
यशोदा ने फिर पूछा—“तो क्या मेरे ममत्व का कोई मूल्य नहीं?”
नंद बाबा ने थके स्वर में कहा—“ममत्व का सचमुच कोई मूल्य नहीं होता, यशोदा। पर देखो तो, कान्हा ने इन ग्यारह वर्षों में हमें कितना सुख दिया है। जब हमने संतान की आशा छोड़ दी थी, तब वह हमारे आँगन में आया। क्या तुम्हें नहीं लगता कि इन वर्षों में हमने ऐसा सुखी जीवन पहले कभी नहीं जिया?”
उन्होंने आगे कहा—“दूसरे की वस्तु से और कितनी आशा रखोगी, यशोदा? एक न एक दिन तो वह अपनी वस्तु माँगेगा ही। कान्हा को जाने दो।”
यशोदा से अब खड़ा नहीं हुआ गया। वे धरती पर बैठ गईं और बोलीं—“आप मुझसे क्या त्याग करवाना चाहते हैं, यह आप नहीं समझ रहे।”
नंद बाबा की आँखें भी भीग गईं। उन्होंने भारी स्वर में कहा—“तुम देवकी को क्या दे रही हो, यह मुझसे बेहतर कौन समझ सकता है, यशोदा! आने वाले असंख्य युगों तक तुम्हारा यह त्याग याद किया जाएगा।”
यशोदा आँचल से चेहरा ढँककर घर की ओर चल दीं। नंद बाबा ने कहा—“अब कन्हैया को भेज दो, देर हो रही है।”
यशोदा ने आँचल और कस लिया और धीमे स्वर में कहा—“एक बार उसे खिला तो लेने दीजिए, अब तो जा ही रहा है, कौन जाने फिर…”
नंद बाबा चुप हो गए।
यशोदा माखन की मटकी लेकर बैठी थीं और भावुक होकर कान्हा को एकटक देखते हुए उसे माखन खिलाती जा रही थीं। कान्हा ने पूछा—“एक बात पूछूँ मइया?”
यशोदा ने कहा—“पूछो लल्ला।”
“तुम तो मुझे रोज माखन खाने पर डाँटती थीं, फिर आज अपने हाथों से क्यों खिला रही हो?”
यशोदा उत्तर देना चाहती थीं, पर स्वर नहीं निकल सका। वे चुपचाप खिलाती रहीं। कान्हा ने फिर पूछा—“क्या सोच रही हो, मइया?”
यशोदा ने आँसू रोकते हुए कहा—“सोच रही हूँ कि तुम चले जाओगे तो मेरी गायों को कौन चराएगा।”
कान्हा ने कहा—“मेरे बारे में भी तो सोचो मइया, वहाँ मुझे माखन कौन खिलाएगा?”
यशोदा ने कान्हा को चूमकर कहा—“वहाँ तुम्हें देवकी रोज माखन खिलाएगी।”
कान्हा ने फिर पूछा—“पर तुम्हारी तरह प्रेम कौन करेगा, मइया?”
यह सुनकर यशोदा कान्हा से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ीं। मन ही मन उन्होंने सोचा—“यशोदा जैसा प्रेम सचमुच कोई नहीं कर सकेगा, पर शायद इस प्रेम की अवधि इतनी ही थी।”
कृष्ण को रथ पर बैठाकर जब नंद बाबा और अक्रूर चलने लगे, तो यशोदा ने कहा—“एक बात और… देवकी से कहना, लल्ला थोड़ा नटखट है, पर कभी मारना नहीं।”
नंद बाबा ने मुंह फेर लिया। यशोदा ने फिर कहा—“कहना कि मैंने लल्ला को कभी दूर्वा से भी नहीं छुआ, हमेशा हृदय से ही लगाया है।”
रथ आगे बढ़ गया। यशोदा पीछे से कहती रहीं—“कहना कि लल्ला को माखन बहुत प्रिय है, उसे ताजा माखन ही खिलाना, बासी माखन में कीड़े पड़ जाते हैं।”
नंद बाबा की आँखें फिर भर आईं। उन्होंने घोड़े को तेज कर दिया। यशोदा ने फिर ऊँचे स्वर में कहा—“कहना कि बड़े कौर उसके गले में अटक जाते हैं, उसे छोटे-छोटे कौर ही खिलाना।”
रथ धूल उड़ाते हुए आगे बढ़ गया। यशोदा वहीं धरती पर बैठ गईं और रोते हुए बोलीं—“कृष्ण से कहना कि मुझे याद रखना।”
उधर रथ में बैठे कृष्ण ने मन ही मन कहा—“तुम्हें यह संसार सदैव याद रखेगा, मइया। तुम्हारे बाद मेरे जीवन में जीवन कहाँ बचता है…”












