चुनाव आयोग की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवालों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर गंभीर बहस को जन्म दे दिया है।
11 मई।
क्षता पर उठते सवाल, लोकतंत्र के लिए गंभीर संकेतदेश में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता की सबसे बड़ी परीक्षा माने जाते हैं। यही कारण है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर जनता का भरोसा लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला होता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर जिस तरह के सवाल उठे हैं, उसने राजनीतिक और संवैधानिक बहस को नई दिशा दे दी है।
विपक्षी दलों द्वारा लगातार यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि चुनाव आयोग कई मामलों में सत्ता पक्ष के प्रति अपेक्षाकृत नरम रवैया अपनाता दिखाई देता है। चुनाव प्रचार के दौरान आचार संहिता उल्लंघन, भड़काऊ भाषणों और सरकारी मशीनरी के कथित दुरुपयोग जैसे मामलों में आयोग की कार्रवाई को लेकर अक्सर विवाद खड़े होते रहे हैं। कई राजनीतिक दलों का कहना है कि आयोग की सक्रियता और कठोरता सभी दलों के लिए समान दिखाई नहीं देती, जिससे उसकी निष्पक्ष छवि प्रभावित होती है।
दरअसल, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल उसके फैसलों से नहीं, बल्कि उन फैसलों के प्रति जनता की धारणा से भी तय होती है। यदि आम मतदाता के मन में यह संदेह पैदा होने लगे कि संवैधानिक संस्थाएं राजनीतिक दबाव में काम कर रही हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति मानी जाएगी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव आयोग की भूमिका किसी रेफरी की तरह होती है, जिस पर सभी पक्षों को समान भरोसा होना चाहिए।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन के दौर का उदाहरण आज भी अक्सर दिया जाता है। उस समय चुनाव आयोग की सख्ती और निष्पक्षता की छवि इतनी मजबूत थी कि राजनीतिक दल भी आयोग के निर्देशों को गंभीरता से लेने को मजबूर रहते थे। चुनावी खर्च, बूथ कब्जा, आचार संहिता उल्लंघन और प्रशासनिक दुरुपयोग जैसे मुद्दों पर आयोग की सख्त कार्रवाई ने चुनाव प्रक्रिया में अनुशासन स्थापित किया था। यही वजह है कि उस दौर को चुनावी सुधारों का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
आज स्थिति पहले जैसी नहीं दिखाई देती। तकनीक और डिजिटल प्रचार के विस्तार ने चुनावों को अधिक जटिल बना दिया है। सोशल मीडिया, डेटा आधारित प्रचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित संदेशों और ऑनलाइन राजनीतिक अभियानों ने चुनाव आयोग के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसे समय में आयोग की भूमिका और अधिक मजबूत, पारदर्शी और सक्रिय होने की अपेक्षा की जाती है।
एक बड़ा प्रश्न चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी लगातार उठता रहा है। कई संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि नियुक्ति प्रणाली में अधिक पारदर्शिता और व्यापक परामर्श की आवश्यकता है, ताकि आयोग की स्वतंत्रता को लेकर किसी प्रकार का संदेह न रहे। लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक माना जाता है।
लेकिन यह भी सही है कि चुनाव आयोग जैसी संस्था पर आरोप लगना कोई नई बात नहीं है। चुनावी राजनीति स्वभाव से ही टकरावपूर्ण होती है और हारने वाला पक्ष अक्सर संस्थाओं पर सवाल उठाता है। लेकिन जब बार-बार विभिन्न दलों और विशेषज्ञों की ओर से समान प्रकार की चिंताएं सामने आने लगें, तब उन्हें केवल राजनीतिक बयानबाजी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव आयोग की साख कमजोर होना केवल एक संस्था का संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास का संकट बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि आयोग अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाए, सभी राजनीतिक दलों के प्रति समान दूरी बनाए रखे और हर निर्णय में निष्पक्षता की स्पष्ट झलक दिखाई दे। लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि निष्पक्ष और भरोसेमंद चुनाव कराने से सुनिश्चित होती है।