भोपाल, 16 अप्रैल 2026
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और पॉक्सो मामलों में उम्र निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पीड़िता की उम्र के संबंध में ठोस और विश्वसनीय प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, तो केवल विद्यालयी अंकसूची में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। इसी आधार पर एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को निरस्त करते हुए आरोपी को बरी कर दिया गया।
यह निर्णय रायसेन जिले से जुड़े एक प्रकरण की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की युगलपीठ द्वारा सुनाया गया। मामले में आरोपी दिनेश वर्मा लोधी पर अपहरण और दुष्कर्म के आरोप लगाए गए थे और बाड़ी थाना क्षेत्र में प्रकरण दर्ज हुआ था।
ट्रायल कोर्ट ने 21 फरवरी 2025 को आरोपी को दोषी मानते हुए 15 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ दायर अपील में आरोपी पक्ष ने तर्क दिया कि पीड़िता बालिग थी और दोनों के बीच सहमति से संबंध थे तथा 8 मार्च 2021 को विवाह भी किया गया था। पीड़िता ने अपने बयान में भी किसी प्रकार के दबाव या दुष्कर्म से इनकार करते हुए स्वयं की आयु उन्नीस वर्ष बताई।
सुनवाई के दौरान न्यायालय के समक्ष ऐसे तथ्य प्रस्तुत हुए, जिनसे पीड़िता की उम्र को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ। पिता ने स्वीकार किया कि जन्मतिथि अनुमान के आधार पर दर्ज कराई गई थी, वहीं विद्यालयी रिकॉर्ड में सुधार भी पाया गया तथा शिक्षक ने बताया कि यह प्रविष्टि केवल अभिभावक के कथन पर आधारित थी।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब उम्र से जुड़े प्रमाण स्वयं विवादित हों, तब केवल अंकसूची को निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी माना कि पीड़िता के बालिग होने की संभावना अधिक प्रतीत होती है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट का निर्णय रद्द करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया।
यह निर्णय दुष्कर्म एवं पॉक्सो मामलों में उम्र निर्धारण की प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत माना जा रहा है।









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