न्यायपालिका
16 Apr, 2026

भोजशाला के धार्मिक स्वरूप विवाद पर हाई कोर्ट में सुनवाई तेज, मंदिर होने के पक्ष में रखे गए तर्क

भोजशाला के धार्मिक स्वरूप विवाद पर इंदौर हाई कोर्ट में सुनवाई जारी है। याचिकाकर्ता पक्ष ने इसे वाग्देवी मंदिर बताते हुए ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर दावे पेश किए।

इंदौर, 15 अप्रैल।

मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर चल रहे विवाद मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में बुधवार से नियमित सुनवाई पुनः प्रारंभ हो गई। याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने विस्तृत दलीलें प्रस्तुत करते हुए इसे वाग्देवी मंदिर बताया।

अदालत में याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने इस्लामिक सिद्धांत हदीस का उल्लेख करते हुए तर्क दिया कि इस्लाम में जबरन भूमि लेकर मस्जिद निर्माण की अनुमति नहीं है और यदि ऐसा कहीं हुआ हो तो उस भूमि को लौटाने के उदाहरण भी मिलते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू मान्यताओं के अनुसार एक बार मंदिर रहा स्थल सदैव मंदिर ही माना जाता है, जिससे स्पष्ट होता है कि भोजशाला वाग्देवी मंदिर है।

बुधवार दोपहर ढाई बजे न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ के समक्ष सुनवाई आरंभ हुई। अधिवक्ता गुप्ता ने पूर्व में अधूरी रही बहस को आगे बढ़ाते हुए 1908 के राजपत्र का हवाला दिया, जिसमें भोजशाला के पत्थरों पर अंकित विवरण का उल्लेख है कि यहां बसंत पंचमी पर राजा भोज द्वारा रचित नाटक का मंचन होता था। उन्होंने राजा भोज की पुस्तकों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें हवन कुंड की संरचना, उसका क्षेत्रफल तथा मंदिर में देवी प्रतिमा के स्वरूप और आकार का विस्तृत वर्णन मिलता है।

अदालत में यह भी तर्क दिया गया कि भोजशाला में निर्मित हवन कुंड का आकार राजा भोज की पुस्तकों में वर्णित माप के अनुरूप है। साथ ही यह दावा किया गया कि ब्रिटिश संग्रहालय में रखी वाग्देवी की प्रतिमा पर अंकित विवरण के अनुसार इसे राजा भोज द्वारा स्थापित किया गया था और यह मूर्ति भोजशाला से ही वहां पहुंची थी, जिससे यह स्थल मंदिर होने की पुष्टि करता है। अब तक हुए एएसआई सर्वेक्षण में परिसर से 150 से अधिक मूर्तियां, आकृतियां और चित्र प्राप्त हुए हैं, जो मंदिर अस्तित्व के प्रमाण माने गए।

अदालत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट और पुरातात्विक साक्ष्यों का भी हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि यहां मिले देवी-देवताओं के अवशेष किसी मस्जिद में संभव नहीं हैं। याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि धार्मिक रूप से इस स्थल पर 24 घंटे पूजा का अधिकार दिया जाना चाहिए।

अधिवक्ता ने इस्लामिक कानून का उल्लेख करते हुए यह भी कहा कि जबरन ली गई भूमि पर मस्जिद निर्माण मान्य नहीं है और ऐसे मामलों में भूमि लौटाने के उदाहरण मौजूद हैं। भोजशाला मामले में चार याचिकाएं और एक अपील एक साथ विचाराधीन हैं। 6 अप्रैल से जारी सुनवाई में अब तक दो याचिकाकर्ताओं के पक्ष रखे जा चुके हैं और अगली सुनवाई गुरुवार को निर्धारित है। 

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