भोपाल, 02 नवंबर।
मध्यप्रदेश को यूं ही हृदय प्रदेश नहीं कहा जाता। यह देश के बीचोंबीच स्थित है और देश की संस्कृति का दिल भी यहीं धड़कता है। यहां दो विशाल पर्वत श्रृंखलाएं, विंध्य और सतपुड़ा, इस प्रदेश को गले लगाती हैं। उत्तर में विंध्य और दक्षिण में सतपुड़ा के बीच नर्मदा की धारा बहती है और यही धारा मध्यप्रदेश को स्वर्णिम बनाती है। इस प्रदेश की मिट्टी में इतिहास है, हवा में आस्था है और जंगलों में जीवन है।
विंध्य और सतपुड़ा की गोद में बसा स्वर्णिम प्रदेश
विंध्याचल पर्वत श्रृंखला मध्यप्रदेश को उत्तर से बांधती है और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला दक्षिण से। विंध्य और सतपुड़ा के बीच ही मध्यप्रदेश की किस्मत लिखी गई है। विंध्य की घाटियों में मैहर की शारदा देवी विराजमान हैं, तो सतपुड़ा की गोद में अमरकंटक से नर्मदा निकलती है। इन पर्वतों ने ही मध्यप्रदेश को प्राकृतिक सुरक्षा दी और आक्रमणकारियों से बचाया। आज भी इन पर्वतों में दुर्लभ वन्यजीव और औषधीय पौधे मिलते हैं। यही पर्वत मध्यप्रदेश को समृद्धि से सराबोर करते हैं।
नदियों का मायका: नर्मदा, चंबल, बेतवा और सोन की कहानी
मध्यप्रदेश नदियों का मायका है। यहां से देश की कई बड़ी नदियां निकलती हैं। नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवनरेखा है। अमरकंटक से निकलकर यह अरब सागर तक जाती है और अपने किनारे महेश्वर, ओंकारेश्वर और अमरकंटक जैसे तीर्थ बसाती है। चंबल अपने बीहड़ों के लिए जानी जाती है, लेकिन यही चंबल घड़ियालों का घर भी है। बेतवा बुंदेलखंड की प्यास बुझाती है और सोन पूर्वी मध्यप्रदेश को उपजाऊ बनाती है। इन नदियों ने ही मध्यप्रदेश को कृषि प्रधान बनाया और सभ्यताओं को जन्म दिया।
वन संपदा का खजाना: हरियाली से भरपूर धरती
मध्यप्रदेश वन संपदा के मामले में देश में अग्रणी है। यहां कान्हा, बांधवगढ़, पेंच, सतपुड़ा और पन्ना जैसे विश्व प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान हैं। कान्हा का बाघ मध्यप्रदेश का गौरव है, तो पन्ना का हीरा उसकी समृद्धि का प्रतीक है। सतपुड़ा के जंगलों में आज भी गोंड, भील और बैगा जनजातियों के लोग रहते हैं और अपनी संस्कृति को बचाए हुए हैं। मध्यप्रदेश के जंगलों में सागौन, साल और महुआ के पेड़ हैं, जो न केवल लकड़ी देते हैं, बल्कि आदिवासी जीवन का आधार भी हैं। यह वन संपदा ही मध्यप्रदेश को प्राणवायु देती है।
महाकाल की नगरी: उज्जैन में विराजमान काल के राजा
मध्यप्रदेश की धार्मिक धरोहरों में सबसे बड़ा नाम महाकालेश्वर का है। उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यहां महाकाल दक्षिणमुखी हैं और कहा जाता है कि जो महाकाल के दरबार में आता है, उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ता। महाकाल की भस्म आरती विश्व प्रसिद्ध है और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं। महाकाल के साथ-साथ उज्जैन में काल भैरव और हरसिद्धि मंदिर भी हैं। क्षिप्रा नदी के किनारे कुंभ का मेला भी यहीं लगता है। उज्जैन केवल मंदिरों का नगर नहीं है, यह समय की गणना का केंद्र भी है।
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग: नर्मदा के बीच बसा ओंकार का चमत्कार
मध्यप्रदेश देश का ऐसा राज्य है, जहां दो ज्योतिर्लिंग विराजमान हैं। उज्जैन में महाकालेश्वर, तो खंडवा के पास नर्मदा के बीच टापू पर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है। ओंकारेश्वर का यह द्वीप नर्मदा की दो धाराओं के बीच बना है और ऊपर से देखने पर यह द्वीप स्वयं ओम के आकार का दिखाई देता है। इसीलिए इसे ओंकारेश्वर कहा जाता है। मान्यता है कि यहां भगवान शिव ने विंध्य पर्वत की तपस्या से प्रसन्न होकर ओंकार के रूप में दर्शन दिए थे। ओंकारेश्वर में दो रूप हैं, एक ओंकारेश्वर और दूसरा ममलेश्वर। दोनों मिलकर ही पूर्ण ज्योतिर्लिंग की मान्यता से जुड़े हैं। नर्मदा के बीच नाव से मंदिर तक जाना और पहाड़ी पर परिक्रमा करना एक अलौकिक अनुभव है। हर साल सावन और महाशिवरात्रि पर यहां लाखों कांवड़िए आते हैं और नर्मदा के जल से शिव का अभिषेक करते हैं। मध्यप्रदेश की गरिमा में ओंकारेश्वर का यह अध्याय सबसे चमकदार है।
रामराजा ओरछा: जहां राम राजा हैं
ओरछा का रामराजा मंदिर मध्यप्रदेश की अनोखी धरोहर है। यह देश का अनूठा मंदिर है, जहां राम की पूजा राजा के रूप में होती है। यहां राम को भगवान के साथ-साथ राजा के रूप में भी प्रतिष्ठित किया गया है और पुलिस का सिपाही उन्हें सलामी देता है। ओरछा में ही चतुर्भुज मंदिर और लक्ष्मी मंदिर भी हैं। बेतवा नदी के किनारे बसे ओरछा के महल और मंदिर बुंदेलखंड के गौरवशाली इतिहास के साक्षी हैं। ओरछा की दीवारों पर आज भी बुंदेला शौर्य की कहानी लिखी है।
भोजपुर का अधूरा शिवलिंग: राजा भोज की विरासत
भोपाल के पास स्थित भोजपुर का विशाल शिवलिंग अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है। इसे राजा भोज ने बनवाया था। मान्यता है कि यह मंदिर एक रात में बनना था, लेकिन निर्माण पूरा नहीं हो पाया। आज भी इस मंदिर की विशालता देखकर लोग हैरान रह जाते हैं। भोजपुर का यह शिवलिंग मध्यप्रदेश के स्थापत्य कौशल का अद्भुत उदाहरण है। भोपाल के पास होने के कारण यहां पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है।
मैहर की शारदा और सलकनपुर की देवी: शक्ति उपासना के दो प्रमुख केंद्र
मैहर में मां शारदा देवी का मंदिर है, जो शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र है। यहां 1063 सीढ़ियां चढ़कर माता के दर्शन होते हैं। कहा जाता है कि यहां सती का हार गिरा था और इसीलिए इसका नाम मैहर पड़ा। मैहर के साथ-साथ सलकनपुर में बिजासन माता का मंदिर भी है, जो विंध्याचल की घाटियों में स्थित है। नवरात्रि में यहां लाखों भक्त आते हैं और पहाड़ी पर चढ़कर माता से आशीर्वाद मांगते हैं। ये दोनों मंदिर मध्यप्रदेश की शक्ति उपासना के प्रमुख प्रतीक हैं।
खजराना गणेश और खजुराहो की कला: आस्था और शिल्प का संगम
इंदौर का खजराना गणेश मंदिर मध्यप्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। यहां गणेशजी की प्रतिमा स्वयंभू मानी जाती है और कहा जाता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। इंदौर के साथ-साथ खजुराहो की ऐतिहासिक धरोहर भी विश्व प्रसिद्ध है। खजुराहो के मंदिर अपनी शिल्पकला के लिए जाने जाते हैं। यहां के मंदिरों में कामशास्त्र और अध्यात्म का अद्भुत संगम दिखाई देता है। खजुराहो के मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं और हर साल हजारों विदेशी पर्यटक यहां आते हैं। खजुराहो ने मध्यप्रदेश को विश्व मानचित्र पर स्थापित किया है।
ऐतिहासिक धरोहरों का गुलदस्ता: सांची, भीमबेटका और मांडू
मध्यप्रदेश में केवल मंदिर ही नहीं, बल्कि बौद्ध और ऐतिहासिक धरोहरें भी हैं। सांची का स्तूप सम्राट अशोक ने बनवाया था और यह बौद्ध धर्म के प्रमुख पवित्र स्थलों में से एक है। भीमबेटका की गुफाओं में आदिमानव द्वारा बनाए गए चित्र आज भी मौजूद हैं। ये गुफाएं प्रागैतिहासिक काल की अनमोल धरोहर हैं। मांडू का जहाज महल और हिंडोला महल अपनी स्थापत्य कला और ऐतिहासिक प्रेम कथाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। ग्वालियर का किला और दतिया का महल अपनी विशालता के लिए जाने जाते हैं। ये सभी धरोहरें मिलकर मध्यप्रदेश को इतिहास का संग्रहालय बनाती हैं।
स्वर्णिम मध्यप्रदेश की पहचान
मध्यप्रदेश केवल एक राज्य नहीं है, यह एक भावना है। यहां विंध्य और सतपुड़ा पर्वत इसकी भुजाएं हैं, नर्मदा और चंबल इसकी नसें हैं, महाकाल और ओंकारेश्वर इसकी दो आंखें हैं, रामराजा और मैहर इसकी आत्मा हैं, खजराना और खजुराहो इसकी कला हैं और कान्हा तथा पन्ना इसकी सांसें हैं। यही समृद्ध सांस्कृतिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक धरोहर मध्यप्रदेश को देश के हृदय प्रदेश की गरिमा देती है और इसे गौरवशाली इतिहास का साक्षी बनाती है।














