भोपाल, 27 मई।
सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत देशभर में शिक्षा को हर घर तक पहुंचाने के दावों के बीच मध्य प्रदेश में बढ़ती महंगाई ने शिक्षा व्यवस्था की कड़वी सच्चाई उजागर कर दी है। लगातार बढ़ते खर्चों के कारण गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों को स्कूल भेजने में भारी आर्थिक दबाव महसूस कर रहे हैं। शिक्षा अब एक मौलिक अधिकार के बजाय एक महंगे बोझ के रूप में सामने आ रही है। राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर आई ताजा रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि स्कूल फीस और अन्य शुल्क अभिभावकों पर भारी पड़ रहे हैं, जिससे अनेक परिवार बच्चों को स्कूल से हटाने तक को मजबूर हो रहे हैं।
राज्य में औसतन स्कूल फीस लगभग 9,874 रुपये सालाना दर्ज की गई है। असली खर्च इससे कहीं अधिक है, क्योंकि परिवहन पर 4,816 रुपये, यूनिफॉर्म पर 1,465 रुपये, किताबों पर 1,775 रुपये और अन्य मदों में 775 रुपये का अतिरिक्त भार अभिभावकों को उठाना पड़ता है। इस तरह कुल खर्च 18,705 रुपये प्रति बच्चे तक पहुंच जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह खर्च लगभग 8,120 रुपये है। शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 19,457 रुपये तक पहुंच जाता है, जिससे स्पष्ट है कि शहरों में शिक्षा का बोझ तेजी से बढ़ रहा है और सीमित आय वाले परिवारों के लिए यह बड़ी चुनौती बन गया है।
रिपोर्ट के अनुसार कुल शिक्षा खर्च में फीस का हिस्सा केवल 11 प्रतिशत है। शेष 89 प्रतिशत खर्च किताबों, ड्रेस और परिवहन जैसी व्यवस्थाओं के नाम पर लिया जा रहा है। हर वर्ष यूनिफॉर्म का डिजाइन बदलकर पुरानी ड्रेस को बेकार कर दिया जाता है और निर्धारित दुकानों से नई खरीदने की मजबूरी बनाई जाती है। इसके साथ ही एनसीईआरटी की अपेक्षाकृत सस्ती पुस्तकों के स्थान पर निजी प्रकाशनों की महंगी किताबें थोपी जा रही हैं। एक्टिविटी, प्रोजेक्ट, वार्षिक कार्यक्रम तथा स्मार्ट क्लास के नाम पर अतिरिक्त वसूली के आरोप भी सामने आए हैं, जिससे अभिभावकों पर लगातार आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।
परिवहन व्यवस्था भी स्कूलों के लिए अतिरिक्त आय का माध्यम बनती जा रही है। बस सेवा को अनिवार्य कर दिया गया है और ऑटो जैसे विकल्पों पर सुरक्षा के नाम पर रोक लगाई जाती है। एडमिशन के समय डोनेशन न लेने के दावों के बावजूद वर्षभर अलग-अलग मदों में शुल्क वसूला जाता है। सरकारी स्कूलों की स्थिति भी इस संकट को गहरा करती है। वहां फीस नहीं ली जाती, लेकिन कॉपी, प्रोजेक्ट और अन्य आवश्यक खर्च अभिभावकों को ही उठाने पड़ते हैं। शिक्षकों की कमी, जर्जर भवन और खराब शौचालय व्यवस्था के कारण गरीब परिवार मजबूरी में निजी स्कूलों का रुख करते हैं। आर्थिक बोझ के चलते बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट रही है, जहां ड्रॉपआउट दर 15 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई है।
सरकार के सामने अब यह चुनौती है कि वह केवल नारेबाजी तक सीमित न रहकर यूनिफॉर्म और किताबों में मनमानी पर रोक लगाए। एनसीईआरटी पुस्तकों को अनिवार्य करे, परिवहन शुल्क पर नियंत्रण लगाए और गरीब परिवारों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता दे। सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार कर उन्हें इतना सक्षम बनाया जाए कि बच्चों को निजी स्कूलों की ओर न जाना पड़े। शिक्षा को वास्तविक रूप से हर घर तक पहुंचाने के लिए यह आवश्यक है कि बस्ता बच्चों के लिए बोझ नहीं बल्कि उम्मीद बने। शिक्षा अधिकार है, व्यापार नहीं। यदि व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियां व्यवस्था की नीयत पर सवाल उठाने को मजबूर होंगी।













