संपादकीय
04 Jun, 2026

मानसून पर मंडरा रहा सूखे का साया: 90% बारिश की उम्मीद पर टिकी अर्थव्यवस्था, महंगाई की आहट से बढ़ी चिंता

भारतीय मौसम विभाग के 92 प्रतिशत वर्षा अनुमान के बीच मध्यप्रदेश में कृषि, बाजार और जल संकट को लेकर संभावित प्रभावों ने चिंता बढ़ा दी है और कमजोर मानसून की आशंका बनी हुई है।

भोपाल, 4 जून।

आसमान की तरफ टकटकी लगाए किसान और बाजार में जेब टटोलता आम आदमी—दोनों की चिंता इस बार एक ही है: मानसून। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने भले ही जून से सितंबर तक सामान्य बारिश का पूर्वानुमान दिया हो, लेकिन इसके साथ जुड़ा एक बड़ा ‘लेकिन’ चिंता बढ़ा रहा है। आईएमडी के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्र के अनुसार, इस बार औसत बारिश 87 से 92 प्रतिशत के बीच रह सकती है। यानी लगभग 90 प्रतिशत वर्षा की संभावना है, लेकिन 10 प्रतिशत तक कमी की आशंका भी बनी हुई है। मध्यप्रदेश में औसत का 92 प्रतिशत वर्षा होने का अनुमान है, जो चिंता का विषय है।

आईएमडी ने अप्रैल में जारी अपने पहले पूर्वानुमान में मानसून को सामान्य बताया था। जून के पहले सप्ताह में जारी संशोधित अनुमान में भी सामान्य मानसून की बात कही गई है, लेकिन बारिश का स्तर औसत से नीचे रहने की आशंका बरकरार है। यहां यह समझना जरूरी है कि ‘सामान्य’ शब्द हमेशा संतोषजनक स्थिति का संकेत नहीं देता। देश के बड़े हिस्से में वर्षा की कमी होने पर भी समग्र औसत सामान्य माना जा सकता है। वर्ष 2015 में भी बारिश सामान्य से कम रही थी और उसके गंभीर परिणाम सामने आए थे।

इस बार सबसे अधिक चिंता मध्यप्रदेश को लेकर है। राज्य की लगभग 70 प्रतिशत खेती सीधे वर्षा पर निर्भर है। जून में बारिश कम हुई तो धान की नर्सरी प्रभावित होगी, जुलाई में कमी रही तो सोयाबीन और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई पर असर पड़ेगा, जबकि अगस्त-सितंबर में पानी नहीं गिरा तो खड़ी फसलें नुकसान झेलेंगी। वर्ष 2015 में प्रदेश में औसत का केवल 86 प्रतिशत पानी बरसा था, जिससे सोयाबीन, मक्का और दलहन की फसलों को भारी नुकसान हुआ था।

कम बारिश का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा प्रभाव आम उपभोक्ता की थाली तक पहुंचता है। मध्यप्रदेश देश का प्रमुख सोयाबीन उत्पादक राज्य है। वर्षा में कमी आने पर उत्पादन घटेगा, जिससे खाद्य तेल महंगा हो सकता है। दाल, चावल और अन्य कृषि उत्पादों की उपलब्धता प्रभावित होने से कीमतों में वृद्धि की आशंका बढ़ जाएगी। सब्जियों और फलों की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है, जिससे रसोई का बजट और बिगड़ेगा।

पशुपालन क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहेगा। चारे की कमी होने पर दूध उत्पादन प्रभावित होगा और दुग्ध उत्पादों के दाम बढ़ सकते हैं। दूसरी ओर जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं भरने से पेयजल संकट गहरा सकता है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे शहर पहले से भूजल स्तर में गिरावट का सामना कर रहे हैं। यदि मानसून कमजोर रहा तो जल संकट और गंभीर रूप ले सकता है।

कम बारिश का प्रभाव ऊर्जा क्षेत्र पर भी पड़ता है। जलाशयों में पानी कम होने से जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही रोजगार पर भी असर पड़ता है। खेती की आय घटने से ग्रामीण मांग कमजोर होती है, जिसका असर बाजार, उद्योग और सेवा क्षेत्र तक दिखाई देता है। मानसून को लेकर बढ़ती आशंकाओं का असर वित्तीय बाजारों में भी दिखाई दिया है। निवेशकों को डर है कि कमजोर मानसून से ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी और उपभोक्ता मांग घटेगी। कृषि पर आधारित उद्योगों, उपभोक्ता वस्तु कंपनियों और वाहन क्षेत्र की बिक्री पर दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि स्थिति अभी पूरी तरह चिंताजनक नहीं कही जा सकती, लेकिन सावधानी बरतना आवश्यक है। सरकार को अपने सूखा प्रबंधन और आकस्मिक योजनाओं को सक्रिय करना होगा। फसल बीमा योजना का दायरा बढ़ाने, जल संरक्षण कार्यों को गति देने और आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी पर सख्ती से निगरानी रखने की जरूरत है। गांवों में तालाबों, जल संरचनाओं और चेक डैमों के निर्माण एवं गहरीकरण जैसे कार्यों को प्राथमिकता देनी होगी।

90 प्रतिशत बारिश का पूर्वानुमान कागज पर सामान्य दिखाई दे सकता है, लेकिन कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए यह जोखिम का संकेत भी है। भारत में मानसून केवल मौसम नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की धुरी है। इसलिए अच्छे मानसून की उम्मीद के साथ कमजोर मानसून की तैयारी भी उतनी ही जरूरी है। क्योंकि जब खेत में दरार पड़ती है, तो उसका असर अंततः पूरे बाजार और आम आदमी की थाली तक पहुंचता है।

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