कोलकाता, 5 जून ।
महाराष्ट्र की सियासी प्रयोगशाला में जो 'दल-बदल मॉडल' सफल हुआ, उसकी छाया अब पश्चिम बंगाल पर पड़ती दिखाई दे रही है। पहले उद्धव ठाकरे की शिवसेना को एकनाथ शिंदे ने तोड़कर पार्टी और 'तीर-कमान' चुनाव चिन्ह पर कब्जा जमाया। इसके बाद शरद पवार की एनसीपी को उनके भतीजे अजित पवार ने 'घड़ी' चुनाव चिन्ह सहित अपने नियंत्रण में ले लिया। अब ऐसी ही चर्चा ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को लेकर शुरू हो गई है।
तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित नेता रिजू दत्ता तथा विधायक संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि 80 में से 50 से अधिक विधायक उनके साथ हैं और वही 'असली तृणमूल कांग्रेस' का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या बंगाल भी महाराष्ट्र की राह पर चल पड़ेगा?
महाराष्ट्र में दोनों राजनीतिक विभाजनों की कहानी लगभग एक जैसी थी। पहले बागी विधायकों का गुट तैयार किया गया, फिर दो-तिहाई बहुमत का दावा पेश किया गया। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग के समक्ष 'असली पार्टी' होने का दावा किया गया तथा चुनाव चिन्ह पर अधिकार प्राप्त करने की कोशिश की गई। शिवसेना में 55 में से 40 विधायक शिंदे गुट के साथ गए थे, जबकि एनसीपी में अजित पवार के साथ 40 से अधिक विधायक थे।
दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए दो-तिहाई बहुमत आवश्यक माना जाता है। तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायकों में यह संख्या 54 बैठती है। बागी गुट 50 से अधिक विधायकों के समर्थन का दावा कर रहा है। यदि यह संख्या 54 तक पहुँचती है, तो विधानसभा अध्यक्ष अलग गुट को मान्यता दे सकते हैं। इसके बाद मामला चुनाव आयोग के पास जाएगा, जहाँ पार्टी और चुनाव चिन्ह पर अंतिम निर्णय होगा।
बागी नेताओं ने तीन प्रमुख मांगें सामने रखी हैं। उनका कहना है कि वही असली तृणमूल कांग्रेस हैं, विपक्ष का नेता शोभनदेव नहीं बल्कि ऋतब्रत बनर्जी होना चाहिए और दो-तिहाई बहुमत होने की स्थिति में 'घास-फूल' चुनाव चिन्ह भी उन्हें मिलना चाहिए। हालांकि, यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दावा करने वाले रिजू दत्ता स्वयं विधायक नहीं हैं और अब तक 54 विधायकों के समर्थन का प्रमाण भी सामने नहीं आया है।
ममता बनर्जी के सामने यह 2011 के बाद की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती मानी जा रही है। तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से ममता-केंद्रित दल रही है। संगठन में स्पष्ट नंबर-दो नेतृत्व कभी स्थापित नहीं हो पाया। अभिषेक बनर्जी को उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिशों से भी कुछ पुराने नेताओं में असंतोष की चर्चा रही है। शुभेंदु अधिकारी पहले ही भाजपा में जा चुके हैं और अब नया असंतोष भी सामने आता दिखाई दे रहा है।
हालांकि, बंगाल और महाराष्ट्र की परिस्थितियों में महत्वपूर्ण अंतर हैं। महाराष्ट्र में सरकार गठबंधन की थी, इसलिए टूट का सीधा असर सत्ता पर पड़ा। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत प्राप्त है। ऐसे में यदि कुछ विधायक अलग भी होते हैं, तब भी सरकार पर तत्काल खतरा नहीं दिखाई देता। यहाँ लड़ाई सत्ता बचाने से ज्यादा पार्टी और चुनाव चिन्ह पर नियंत्रण की है।
दूसरा बड़ा अंतर ममता बनर्जी का राजनीतिक कद है। वे आज भी बंगाल की सबसे प्रभावशाली जननेताओं में गिनी जाती हैं। तृणमूल कांग्रेस का वोट बैंक काफी हद तक उनके व्यक्तिगत नेतृत्व से जुड़ा हुआ है। ऐसे में बागी विधायकों को जनता के बीच वैसी स्वीकार्यता मिलना आसान नहीं होगा।
इस पूरे मामले में चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका निर्णायक रहेगी। आयोग विधायक संख्या, संगठनात्मक ढांचे और पार्टी संविधान जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला करेगा। फिलहाल, बागी गुट का दावा 50 विधायकों तक सीमित है, जबकि दो-तिहाई बहुमत के लिए 54 का आंकड़ा आवश्यक है।
फिलहाल, स्थिति को तूफान तो कहा जा सकता है, लेकिन सुनामी कहना जल्दबाजी होगी। फिर भी यह तृणमूल कांग्रेस के लिए चेतावनी जरूर है कि संगठनात्मक असंतोष को समय रहते दूर किया जाए। भारतीय राजनीति में अब विचारधारा से अधिक संख्या बल की चर्चा होने लगी है और यही लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय माना जा रहा है। आने वाले समय में बंगाल की राजनीति किस दिशा में जाएगी, इस पर देशभर की नजरें टिकी रहेंगी।














