नई दिल्ली, 05 जून ।
विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने और भारत को वैश्विक निवेश केंद्र के रूप में और मजबूत बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए कई महत्वपूर्ण सुधारों की घोषणा की है। इन बदलावों के तहत निवेश संबंधी नियमों को सरल बनाया गया है और सरकारी प्रतिभूतियों तक विदेशी निवेशकों की पहुंच का विस्तार किया गया है।
वित्त मंत्रालय के अनुसार अब भारत के बाहर रहने वाले व्यक्तिगत निवेशकों को भी पोर्टफोलियो निवेश योजना के माध्यम से भारतीय सूचीबद्ध कंपनियों के इक्विटी साधनों में निवेश की अनुमति मिलेगी। पहले यह सुविधा केवल अनिवासी भारतीयों और भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों तक सीमित थी। नए प्रावधान के तहत किसी एक कंपनी में व्यक्तिगत निवेश सीमा 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत कर दी गई है, जबकि सभी ऐसे निवेशकों की कुल सीमा 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 24 प्रतिशत कर दी गई है।
इन परिवर्तनों को लागू करने के लिए आर्थिक कार्य विभाग विदेशी मुद्रा प्रबंधन नियमों में संशोधन संबंधी अधिसूचना जारी करेगा।
सरकार ने पूर्ण सुलभ मार्ग के अंतर्गत आने वाली सरकारी प्रतिभूतियों की सूची का भी विस्तार किया है। अब 15 वर्ष, 30 वर्ष और 40 वर्ष अवधि वाले नए सरकारी बॉन्ड तथा पात्र अवधि वाले संप्रभु हरित बॉन्ड भी इसमें शामिल किए जाएंगे।
इसके साथ ही सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के निवेश पर लागू तीन प्रमुख प्रतिबंधों को समाप्त कर दिया गया है। इनमें अल्पकालिक निवेश सीमा, एकाग्रता सीमा और प्रतिभूति-विशिष्ट सीमा शामिल हैं। हालांकि केंद्र सरकार की बकाया प्रतिभूतियों में 6 प्रतिशत और राज्य सरकार की प्रतिभूतियों में 2 प्रतिशत की कुल निवेश सीमा यथावत रहेगी।
सरकार ने सरकारी प्रतिभूतियों और राज्य सरकार की प्रतिभूतियों में विदेशी निवेश के लिए मौजूद सामान्य और दीर्घकालिक श्रेणियों को भी एकीकृत कर एक ही श्रेणी बनाने का निर्णय लिया है।
एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले के तहत विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश से होने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर आयकर से छूट प्रदान की गई है। यह छूट 1 अप्रैल 2026 या उसके बाद अर्जित आय पर लागू होगी। इसी प्रकार की कर छूट अंतरराष्ट्रीय निपटान बैंक को भी प्रदान की गई है।
वित्त मंत्रालय का मानना है कि इन सुधारों से भारतीय शेयर बाजार और सरकारी बॉन्ड बाजार में निवेशकों का आधार बढ़ेगा, बॉन्ड बाजार में तरलता मजबूत होगी तथा पेंशन फंड, बीमा कंपनियों और संप्रभु संपत्ति कोष जैसे दीर्घकालिक निवेशकों को आकर्षित करने में मदद मिलेगी।








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