मध्य पूर्व, 05 जून ।
मध्य पूर्व में संघर्ष विराम के कई समझौते लागू होने के बावजूद क्षेत्र में हिंसा पूरी तरह थमती नजर नहीं आ रही है। इस सप्ताह गाजा, दक्षिणी लेबनान, उत्तरी इजरायल और कुवैत में हमलों और सैन्य गतिविधियों की घटनाएं सामने आई हैं।
अमेरिका की मध्यस्थता से हुए युद्धविराम समझौतों का उद्देश्य बड़े स्तर की लड़ाई रोकना था, लेकिन कई क्षेत्रों में छिटपुट हमले और जवाबी कार्रवाई लगातार जारी हैं। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में टिप्पणी की कि युद्धविराम का मतलब पूरी तरह गोलीबारी रुकना नहीं, बल्कि संघर्ष की तीव्रता में कमी आना है।
गाजा में अक्टूबर 2025 में युद्धविराम समझौता लागू हुआ था। इसके तहत बंधकों की रिहाई, कैदियों की अदला-बदली, सहायता सामग्री की आपूर्ति और चरणबद्ध सैन्य वापसी जैसे प्रावधान शामिल थे। हालांकि कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अब तक प्रगति सीमित रही है। सहायता आपूर्ति, पुनर्निर्माण और निरस्त्रीकरण जैसे मुद्दे अभी भी अधूरे हैं।
लेबनान में भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी है। हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच पहले हुए समझौतों के बावजूद दोनों पक्ष एक-दूसरे पर उल्लंघन के आरोप लगाते रहे हैं। मार्च में क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के बाद फिर से सैन्य गतिविधियां तेज हुईं और कई इलाकों में संघर्ष जारी है।
अमेरिका और ईरान के बीच भी अप्रैल में संघर्ष विराम की घोषणा हुई थी। इसके बाद कई दौर की अप्रत्यक्ष वार्ताएं हुईं, लेकिन व्यापक समझौते तक पहुंचने में सफलता नहीं मिल सकी। परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े मुद्दे अब भी प्रमुख विवादों में शामिल हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि अधिकांश समझौते प्रारंभिक चरण से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। स्थायी समाधान के लिए आवश्यक राजनीतिक सहमति और कठिन समझौतों की कमी के कारण युद्धविराम लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह पा रहे हैं। कई बार पक्ष अपने रणनीतिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए सैन्य दबाव का सहारा भी लेते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक प्रक्रिया में ठहराव, क्षेत्रीय शक्तियों की बढ़ती सक्रियता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सीमित प्रभाव के कारण दीर्घकालिक शांति स्थापित करना और अधिक चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।








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