भोपाल, 02 नवंबर।
एक नवंबर 1956 को जब मध्य प्रदेश बना था, तो लोग कहते थे कि यह बीमारू राज्य है, लेकिन आज वही राज्य हिंदुस्तान का धड़कता दिल है। इस इकहत्तर साल के सफर में हर मुख्यमंत्री ने एक ईंट जोड़ी है, हर समाज ने पसीना बहाया है और हर नदी-पहाड़ ने आशीर्वाद दिया है। यह लेख उसी व्यापक मध्य प्रदेश की समीक्षा है, जो केवल नक्शे का टुकड़ा नहीं, बल्कि संस्कृति, सियासत और प्रकृति का संगम है।
बुनियाद के शिल्पी: पंडित रविशंकर से द्वारका प्रसाद तक
मध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल ने भोपाल को राजधानी बनाया और नए राज्य को आकार दिया। उनके बाद भगवंतराव मंडलोई और कैलाशनाथ काटजू ने शिक्षा और प्रशासन की नींव रखी। द्वारका प्रसाद मिश्रा ने उद्योग का सपना देखा और भारी उद्योगों की नींव रखी। श्यामाचरण शुक्ल और प्रकाशचंद्र सेठी ने कांग्रेस को गांव-गांव तक पहुंचाया। नेहरू युग के इन नेताओं ने मध्य प्रदेश को केवल सड़कों से नहीं, बल्कि संस्थाओं से बनाया।
विकल्प की आहट: कैलाश जोशी से सुंदरलाल पटवा तक
1977 में जब देश में जनता पार्टी की लहर आई, तो कैलाश जोशी मध्य प्रदेश के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। उन्होंने विकेंद्रीकरण का मंत्र दिया कि सत्ता भोपाल से निकलकर गांव तक जाए। वीरेंद्र कुमार सकलेचा ने सादगी की मिसाल दी और सुंदरलाल पटवा ने भाजपा के लिए जमीन तैयार की। पटवा जी ने मालवा को औद्योगिक पहचान दी और ईमानदार प्रशासन की छवि बनाई। यह वह दौर था, जब मध्य प्रदेश में दो धाराएं बनीं, एक कांग्रेस की सामाजिक न्याय वाली और दूसरी भाजपा की विकास वाली।
सामाजिक क्रांति के साल: अर्जुन सिंह से मोतीलाल वोरा तक
अस्सी के दशक में अर्जुन सिंह ने मध्य प्रदेश को सामाजिक प्रयोगशाला बना दिया। आदिवासी, पिछड़े और गरीब छात्रों के लिए स्कूल और छात्रवृत्तियां शुरू की गईं। भोपाल गैस त्रासदी जैसी कठिन परीक्षा भी इसी दौर में आई, लेकिन प्रशासन ने हिम्मत दिखाई। मोतीलाल वोरा ने सादगी और साफ छवि की राजनीति की। श्यामाचरण शुक्ल ने तीसरी बार आकर स्थिरता दी। इसी दौर में भारत भवन और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय जैसे सांस्कृतिक केंद्र बने, जिन्होंने भोपाल को कला की राजधानी बना दिया।
दस साल का जिला सरकार प्रयोग: दिग्विजय मॉडल
1993 से 2003 तक दिग्विजय सिंह ने लगातार दस साल शासन किया। उन्होंने जिला सरकार का अनोखा प्रयोग किया और कलेक्टर को कैबिनेट जैसी ताकत दी। शिक्षा गारंटी योजना और एकलव्य विद्यालय शुरू किए। पंचायती राज को असली ताकत दी गई। भोपाल में सड़कों और चार्टर्ड बसों का जाल बिछा और सूचना प्रौद्योगिकी की नींव पड़ी। यह दौर मध्य प्रदेश को बीमारू राज्य की छवि से बाहर निकालने का दौर था।
मामा का युग: उमा से शिवराज तक, स्वर्णिम उड़ान
2003 में भाजपा की वापसी हुई। उमा भारती ने नदी और गौ-रक्षा का नारा दिया। बाबूलाल गौर ने भोपाल को मेट्रो का सपना दिखाया। फिर 2005 में शिवराज सिंह चौहान आए और प्रदेश की तस्वीर बदल दी। लाड़ली लक्ष्मी, मुख्यमंत्री कन्यादान, संबल और फिर लाड़ली बहना जैसी योजनाओं ने महिला सशक्तीकरण का नया मॉडल दिया। सिंचाई का रकबा सात लाख हेक्टेयर से बढ़कर पैंतालीस लाख हेक्टेयर हो गया। गेहूं उत्पादन में मध्य प्रदेश ने पंजाब को पीछे छोड़ दिया। सड़कों की लंबाई दोगुनी हुई और बिजली सरप्लस हुई। कमलनाथ ने पंद्रह महीने में कर्जमाफी और मिलावट के खिलाफ युद्ध जैसे प्रयोग किए।
नए इंजन की सरकार: मोहन युग की शुरुआत
महाकाल लोक का दौर अब डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश विकास की तीसरी पीढ़ी में प्रवेश कर रहा है। उज्जैन में महाकाल लोक, इंदौर में स्वच्छता का विश्व रिकॉर्ड, भोपाल में ग्लोबल स्किल पार्क, जबलपुर में रक्षा उत्पादन और रीवा में एशिया का सबसे बड़ा सोलर प्लांट, ये सब बताते हैं कि मध्य प्रदेश अब केवल कृषि प्रधान नहीं, बल्कि ज्ञान, पर्यटन और ऊर्जा प्रधान भी है।
सभी रंगों का प्रदेश, एक ही थाली के व्यंजन
मध्य प्रदेश केवल भाजपा या कांग्रेस का नहीं है। यहां बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और आम आदमी पार्टी भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराती हैं। हर दल ने प्रदेश को कुछ दिया है। कांग्रेस ने सामाजिक न्याय का पाठ पढ़ाया, भाजपा ने सुशासन का मंत्र दिया और आदिवासी दलों ने जल, जंगल और जमीन की आवाज उठाई। विंध्य में एक रंग है, तो निमाड़ में दूसरा। बुंदेलखंड में एक बोली है, तो बघेलखंड में दूसरी। यही विविधता मध्य प्रदेश की ताकत है।
जंगल के असली मालिक: बाईस जनजातियां
मध्य प्रदेश में बाईस जनजातियां रहती हैं। भील, गोंड, बैगा, सहरिया, भारिया, कोरकू और कोल जैसी जनजातियों ने जंगल को बचाया है और जंगल ने इन्हें बचाया है। भगोरिया हाट, करमा, सैला और राई नृत्य केवल नृत्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन हैं। यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध सभी मिलकर रहते हैं। उज्जैन के महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर का ज्योतिर्लिंग, मैहर की शारदा, अमरकंटक में नर्मदा का उद्गम और ओरछा के रामराजा सभी धर्मों को एक माला में पिरोते हैं।
सात नदियां, दो पर्वत और एक जंगल की दुनिया
मध्य प्रदेश की पहचान उसकी नदियों से है। नर्मदा, चंबल, बेतवा, सोन, केन, ताप्ती और शिप्रा सात जीवन रेखाएं हैं, जो पूरे प्रदेश को सींचती हैं। विंध्य और सतपुड़ा दो पर्वतमालाएं हैं, जो उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ती हैं। कान्हा, बांधवगढ़, पेंच, सतपुड़ा, संजय और रातापानी टाइगर रिजर्व में बाघों की बड़ी आबादी है। इसी कारण मध्य प्रदेश को टाइगर स्टेट और लेपर्ड स्टेट दोनों कहा जाता है। पचमढ़ी हिल स्टेशन है, तो अमरकंटक तीर्थ।
दुनिया जिसे देखने आती है: तीन विश्व धरोहर स्थल
मध्य प्रदेश में तीन विश्व धरोहर स्थल हैं। खजुराहो के मंदिर प्रेम और शिल्प के प्रतीक हैं, सांची का स्तूप बुद्ध के शांति संदेश का प्रतीक है और भीमबेटका के शैलचित्र हजारों साल पुरानी मानव सभ्यता के गवाह हैं। इनके अलावा ग्वालियर का किला, मांडू का जहाज महल, ओरछा की छतरियां, भेड़ाघाट का धुआंधार और उज्जैन का सिंहस्थ दुनिया भर के पर्यटकों को खींचते हैं। इंदौर की स्वच्छता और भोपाल की झीलें शहरी पर्यटन का नया अध्याय लिख रही हैं।
प्रगतिशील मध्य प्रदेश की नई तस्वीर
आज मध्य प्रदेश बदल रहा है। इंदौर से पीथमपुर तक औद्योगिक कॉरिडोर, धार में ऑटो हब और ग्वालियर में एजुकेशन हब विकसित हो रहे हैं। किसान अब केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि सौर ऊर्जा से ऊर्जादाता भी बन रहा है। युवा स्टार्टअप शुरू कर रहा है, महिलाएं लखपति दीदी बन रही हैं और आदिवासी युवा डॉक्टर-इंजीनियर बन रहे हैं। यही बदलता, प्रगतिशील मध्य प्रदेश है, जो अपनी जड़ों से जुड़ा है और आसमान की ओर देख रहा है।
इकहत्तर साल का यह दिल अब और तेज धड़केगा।














