जयपुर, 11 मई।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने एनडीपीएस एक्ट से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि केवल सह-आरोपी के बयान के आधार पर किसी व्यक्ति को मुकदमे में घसीटना उचित नहीं माना जा सकता और ऐसे मामलों में ठोस साक्ष्य अनिवार्य हैं।
न्यायालय ने यह भी कहा कि चार्ज तय करते समय ट्रायल कोर्ट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यदि साक्ष्यों में कोई कमी है तो निर्दोष व्यक्ति को राहत देने के लिए संबंधित विधिक प्रावधानों का सहारा लिया जाए, ताकि अनावश्यक रूप से किसी को मुकदमे की प्रक्रिया में न उलझना पड़े।
अदालत ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि पर्याप्त और स्वतंत्र साक्ष्यों के अभाव में लोगों को केवल बयान के आधार पर आरोपी बनाया जा रहा है, जिससे न केवल उन्हें हिरासत में रहना पड़ता है बल्कि लंबी न्यायिक प्रक्रिया का भी सामना करना पड़ता है।
न्यायालय ने यह टिप्पणी भी की कि चार्जशीट दाखिल करने से पहले अभियोजन पक्ष से पर्याप्त परामर्श की व्यवस्था की कमी के कारण कई बार कमजोर मामलों में भी मुकदमे आगे बढ़ जाते हैं।
इस प्रकरण में न्यायालय ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्य पर्याप्त नहीं हैं और यदि सभी पहलुओं पर ठीक से विचार किया जाता तो याचिकाकर्ता को अनावश्यक मुकदमे का सामना नहीं करना पड़ता।
अदालत ने आदेश की प्रति गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को भेजते हुए कहा कि पुलिस की लापरवाही से निर्दोष लोगों को परेशानी न हो, इसके लिए आवश्यक कार्रवाई की जाए।
न्यायाधीश ने ब्यावर जेल में बंद अक्षय की जमानत मंजूर करते हुए उसे रिहा करने का आदेश भी दिया।
मामला ब्यावर सदर थाना क्षेत्र में दर्ज उस प्रकरण से संबंधित है, जिसमें 18 फरवरी 2026 को एक व्यक्ति से स्मैक बरामद होने के बाद पूछताछ में सप्लाई चेन से जुड़े नाम के आधार पर याचिकाकर्ता को भी आरोपी बनाया गया था, हालांकि उसके खिलाफ प्रत्यक्ष बरामदगी नहीं हुई थी।



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