संपादकीय
09 May, 2026

फर्जी जाति प्रमाणपत्र मामलों में ‘कछुआ न्याय’ पर सवाल: मध्य प्रदेश की छानबीन समितियों में दबी सच्चाई

मध्य प्रदेश में फर्जी जाति प्रमाणपत्रों से जुड़े लंबे समय से लंबित मामलों की धीमी जांच प्रक्रिया और समितियों की निष्क्रियता पर गंभीर सवाल उठाते हुए सामाजिक न्याय व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर चिंता जताई गई है।

09 मई।
मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति और जनजाति के फर्जी जाति प्रमाणपत्रों के सहारे सरकारी नौकरियों और ऊंचे पदों तक पहुंचने वालों की जांच जिस रफ्तार से चल रही है, उसे देखकर लगता है मानो न्याय व्यवस्था ने स्वयं “कछुआ चाल” को अपना आदर्श बना लिया हो। जिन मामलों में कुछ महीनों में निर्णय होना चाहिए था, वे 20-25 वर्षों से सरकारी फाइलों में धूल खा रहे हैं। शिकायतकर्ता बूढ़े हो रहे हैं, कई लोगों की मृत्यु तक हो चुकी है, लेकिन छानबीन समितियों की नींद अब तक नहीं टूटी।
यह केवल प्रशासनिक सुस्ती नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की आत्मा पर सीधा हमला है। जिन आरक्षित पदों पर वास्तविक दलित और आदिवासी युवाओं का अधिकार था, वहां कथित फर्जी प्रमाणपत्रधारी वर्षों से मलाई काट रहे हैं और सरकार केवल “जांच जारी है” का रटा-रटाया उत्तर देकर अपने कर्तव्य से पल्ला झाड़ रही है।
सबसे चौंकाने वाला मामला शिक्षिका आशा की जाति जांच का है। शिकायत 4 जनवरी 2001 को हुई थी। आज 23 वर्ष से अधिक बीत चुके हैं, लेकिन मामला अब भी “जानकारी प्राप्त होने” के इंतजार में अटका पड़ा है। यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था का चेहरा है। रायसेन के स्वास्थ्य कार्यकर्ता राजेंद्र कुमार का मामला 19 जनवरी 2005 से लंबित है। पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट का इंतजार अब तक खत्म नहीं हुआ। सवाल यह है कि क्या मध्य प्रदेश की पुलिस और प्रशासन को एक रिपोर्ट तैयार करने में दो दशक लगते हैं। यदि हां, तो यह शासन व्यवस्था नहीं, प्रशासनिक विफलता का जीवंत उदाहरण है।
इन लंबित मामलों की सूची पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि जांच की रफ्तार केवल इसलिए धीमी नहीं है कि सिस्टम कमजोर है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि आरोपी रसूखदार हैं। इनमें न्यायपालिका से जुड़े पदाधिकारी, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, अवर सचिव, मुख्य अभियंता, अधीक्षक यांत्रिक और नगर निगम की पूर्व महापौर जैसे प्रभावशाली लोग शामिल हैं। द्वितीय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, वल्लभ भवन भोपाल में पदस्थ अवर सचिव राधेश्याम बघेल, प्रभारी मुख्य अभियंता रामदयाल अहिरवार, लोक निर्माण विभाग के अधीक्षक यांत्रिक जिले सिंह और मुरैना नगर निगम की पूर्व महापौर शारदा सोलंकी जैसे मामलों में वर्षों से जांच अधर में लटकी हुई है। कई मामलों में उच्च न्यायालय जबलपुर में याचिकाएं लंबित हैं, लेकिन शासन और नौकरशाही की लेट-लतीफी ने पूरी प्रक्रिया को मजाक बनाकर रख दिया है। यदि यही आरोप किसी गरीब या छोटे कर्मचारी पर होता, तो शायद महीनों में निलंबन और कार्रवाई हो जाती। लेकिन जब मामला बड़े अधिकारियों और रसूखदारों का हो, तब फाइलें अचानक सुस्त पड़ जाती हैं।
सबसे शर्मनाक तथ्य यह है कि 21 अगस्त 2023 तक की सूची में ऐसे लोगों के नाम भी लंबित मामलों में दर्ज हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है। मृत्यु प्रमाणपत्र रिकॉर्ड में शामिल होने के बावजूद समितियां उन्हें “लंबित” श्रेणी में रखे हुए हैं। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। इससे स्पष्ट होता है कि जांच समितियां केवल औपचारिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए बैठी हैं। उन्हें न पीड़ितों की चिंता है, न सामाजिक न्याय की और न संविधान की आत्मा की।
फर्जी जाति प्रमाणपत्र केवल कागज का टुकड़ा नहीं होता, यह किसी गरीब दलित या आदिवासी युवक के सपनों की चोरी है। जब कोई व्यक्ति झूठे प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल करता है, तब वह किसी वास्तविक पात्र उम्मीदवार का अधिकार छीनता है। एक तरफ गांवों में पढ़ाई कर संघर्ष करने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के हजारों युवा बेरोजगारी से जूझ रहे हैं, दूसरी तरफ प्रभावशाली लोग सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाकर वर्षों तक सरकारी वेतन, पद और सुविधाएं भोग रहे हैं। और जब शिकायत होती है, तब जांच इतनी धीमी कर दी जाती है कि आरोपी या तो रिटायर हो जाए या फिर उसकी मृत्यु हो जाए। उसके बाद मामला स्वतः समाप्त मान लिया जाता है।
सरकार मंचों से सामाजिक न्याय, दलित अधिकार और आदिवासी कल्याण के बड़े-बड़े भाषण देती है, लेकिन जमीन पर हकीकत बिल्कुल अलग है। यदि सरकार वास्तव में गंभीर होती, तो इन मामलों के लिए समयबद्ध जांच प्रणाली बनाई जाती, दोषियों पर कठोर कार्रवाई होती, फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी पाने वालों से वेतन वसूली जाती और उन्हें तत्काल सेवा से बर्खास्त किया जाता। लेकिन यहां तो स्थिति उल्टी है। शिकायतकर्ता ही वर्षों तक दफ्तरों के चक्कर काटता रहता है। उसे न सुनवाई मिलती है, न न्याय, जबकि आरोपी आराम से पद, प्रतिष्ठा और पेंशन का लाभ उठाते रहते हैं।
अब समय आ गया है कि मध्य प्रदेश सरकार इस पूरे तंत्र की जवाबदेही तय करे। सभी लंबित मामलों की समयबद्ध सुनवाई हो, छानबीन समितियों की कार्यप्रणाली सार्वजनिक की जाए, हर मामले की स्थिति ऑनलाइन उपलब्ध कराई जाए और छह महीने के भीतर निर्णय अनिवार्य किया जाए। साथ ही जिन अधिकारियों की लापरवाही से जांच वर्षों तक लंबित रही, उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए, क्योंकि न्याय में देरी केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि न्याय की हत्या है। यदि सरकार अब भी नहीं जागी, तो यह संदेश जाएगा कि मध्य प्रदेश में फर्जी जाति प्रमाणपत्रों के खिलाफ कानून केवल गरीबों के लिए है, जबकि रसूखदारों के लिए फाइलों में दफन “कछुआ न्याय” ही अंतिम सच है।
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