अयोध्या, 24 मार्च।
रामनवमी का पर्व अयोध्या में केवल जन्मोत्सव नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और भारतीय सभ्यता की हजारों वर्ष पुरानी आध्यात्मिक स्मृति का जीवंत उत्सव है। संत परंपरा और पुराणों की मान्यता है कि रामनवमी के दिन ब्रह्मांड के सभी पवित्र तीर्थ अयोध्या में आकर विराजते हैं। यही कारण है कि यह पर्व धर्म, मर्यादा और आदर्शों के प्रतीक भगवान श्रीराम की जन्मभूमि में विशेष रूप से मनाया जाता है।
प्रो. ब्रजभूषण त्रिपाठी ने बताया कि रामनवमी के दिन सभी तीर्थों के अयोध्या आगमन की मान्यता केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि सनातन युग से चली आ रही परंपरा का प्रतीक है। जब अयोध्या में जय श्रीराम का उद्घोष गूंजता है, यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की अमर चेतना का अनुभव बन जाता है।
भगवान श्रीराम को केवल ऐतिहासिक या धार्मिक पात्र नहीं, बल्कि सनातन युग के आदर्शों के जीवंत प्रतीक के रूप में देखा जाता है। त्रेतायुग में उनका अवतार केवल एक राजकुमार के जन्म की घटना नहीं थी, बल्कि धर्म, मर्यादा और न्याय के मार्ग की स्थापना थी। अयोध्या को सनातन परंपरा में दिव्य और मोक्षदायिनी नगरी माना गया है।
स्कंद पुराण और पद्म पुराण में उल्लेख है कि रामनवमी के दिन अयोध्या में किए गए स्नान, जप और दान का फल कई तीर्थों के दर्शन के समान होता है। संत परंपरा के अनुसार जब भगवान श्रीराम का अवतरण हुआ, तब देवता, ऋषि और पवित्र नदियां भी इस दिव्य क्षण के साक्षी बनने अयोध्या पहुंचे थे।
रामनवमी के दिन अयोध्या का दृश्य प्राचीन सनातन युग की स्मृतियों को जीवंत कर देता है। सरयू के तट पर आस्था की लहरें उठती हैं, मंदिरों में भजन-कीर्तन गूंजते हैं और जय श्रीराम के उद्घोष से पूरा नगर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है। लाखों श्रद्धालु सरयू में स्नान कर प्रभु के दर्शन करते हैं और उस दिव्य क्षण का अनुभव करते हैं जब सनातन संस्कृति का सबसे उज्ज्वल आदर्श इस धरती पर अवतरित हुआ।
समय और युग बदलते रहे, लेकिन रामनवमी की यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है। अयोध्या में उमड़ती आस्था केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में बसे करोड़ों लोगों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती है। डिजिटल युग में अयोध्या से प्रसारित राम जन्मोत्सव के दृश्य दुनिया के अनेक देशों तक पहुंचते हैं और भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक शक्ति का संदेश देते हैं।
आज श्रीराम जन्मभूमि का यह पर्व विश्व स्तर पर भारतीय संस्कृति की पहचान बन गया है। अयोध्या से प्रसारित रामनवमी के दृश्य, भजन-कीर्तन और सरयू घाट की दिव्यता दुनिया भर में करोड़ों लोगों तक पहुँचती है। यह पर्व अब सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि मानवता, नैतिकता और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक बन चुका है।


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