मंत्रालय के एक बड़े साहब इन दिनों गाड़ियों के चलते ज्यादा चर्चा में हैं, काम के चलते कम। सरकारी गाड़ियां बदलना तो उनका पुराना शौक रहा ही, पर असली दिलचस्पी निजी कलेक्शन में रही। अब रिटायरमेंट सिर पर है और घर की पार्किंग छोटी पड़ गई, तो फरमान जारी—“जितने में ली थी, उतने में ही बेचो।” खरीदार आए, तो साहब खुद सेल्समैन बनकर फीचर्स समझाते नजर आते हैं। फर्क बस इतना है कि यहां गाड़ी के साथ ‘पद’ का एक्स्ट्रा वैल्यू टैग भी जुड़ा हुआ है।












