एक साहब, जिनकी पहचान काम से कम और नाफरमानी से ज्यादा बनी, आखिरकार कुर्सी से खिसक ही गए। 2024 से 2026 तक महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए उन्होंने मिलने-जुलने की परंपरा को ही खत्म कर दिया—जनता तो दूर, जनप्रतिनिधि भी दर्शन को तरसते रहे। शिकायतों का पुलिंदा ऊपर तक पहुंचा, पर कार्रवाई तब हुई जब “सब्र का घड़ा” भर गया। अब नेताजी खुश हैं और साहब दुखी—क्योंकि शानदार पारी बीच में ही घोषित कर दी गई।












